「じゃ何と云うんだ」
「ハイカラ野郎の、ペテン師の、イカサマ師の、猫被りの、香具師の、モモンガーの、岡っ引きの、わんわん鳴けば犬も同然な奴とでも云うがいい」
「おれには、そう舌は廻らない。君は能弁だ。第一単語を大変たくさん知ってる。それで演舌が出来ないのは不思議だ」
「なにこれは喧嘩のときに使おうと思って、用心のために取っておく言葉さ。演舌となっちゃ、こうは出ない」
「そうかな、しかしぺらぺら出るぜ。もう一遍やって見たまえ」
「何遍でもやるさいいか。――ハイカラ野郎のペテン師の、イカサマ師の……」と云いかけていると、椽側をどたばた云わして、二人ばかり、よろよろしながら馳け出して来た。
「両君そりゃひどい、――逃げるなんて、――僕が居るうちは決して逃さない、さあのみたまえ。――いかさま師?――面白い、いかさま面白い。――さあ飲みたまえ」
とおれと山嵐をぐいぐい引っ張って行く。実はこの両人共便所に来たのだが、酔ってるもんだから、便所へはいるのを忘れて、おれ等を引っ張るのだろう。酔っ払いは目の中る所へ用事を拵えて、前の事はすぐ忘れてしまうんだろう。
「さあ、諸君、いかさま師を引っ張って来た。さあ飲ましてくれたまえ。いかさま師をうんと云うほど、酔わしてくれたまえ。君逃げちゃいかん」
と逃げもせぬ、おれを壁際へ圧し付けた。諸方を見廻してみると、膳の上に満足な肴の乗っているのは一つもない。自分の分を奇麗に食い尽して、五六間先へ遠征に出た奴もいる。校長はいつ帰ったか姿が見えない。
ところへお座敷はこちら? と芸者が三四人はいって来た。おれも少し驚ろいたが、壁際へ圧し付けられているんだから、じっとしてただ見ていた。すると今まで床柱へもたれて例の琥珀のパイプを自慢そうに啣えていた、赤シャツが急に起って、座敷を出にかかった。向うからはいって来た芸者の一人が、行き違いながら、笑って挨拶をした。その一人は一番若くて一番奇麗な奴だ。遠くで聞えなかったが、おや今晩はぐらい云ったらしい。赤シャツは知らん顔をして出て行ったぎり、顔を出さなかった。大方校長のあとを追懸けて帰ったんだろう。
芸者が来たら座敷中急に陽気になって、一同が鬨の声を揚げて歓迎したのかと思うくらい、騒々しい。そうしてある奴はなんこを攫む。その声の大きな事、まるで居合抜の稽古のようだ。こっちでは拳を打ってる。よっ、はっ、と夢中で両手を振るところは、ダーク一座の操人形よりよっぽど上手だ。向うの隅ではおいお酌だ、と徳利を振ってみて、酒だ酒だと言い直している。どうもやかましくて騒々しくってたまらない。そのうちで手持無沙汰に下を向いて考え込んでるのはうらなり君ばかりである。自分のために送別会を開いてくれたのは、自分の転任を惜んでくれるんじゃない。みんなが酒を呑んで遊ぶためだ。自分独りが手持無沙汰で苦しむためだ。こんな送別会なら、開いてもらわない方がよっぽどましだ。
しばらくしたら、めいめい胴間声を出して何か唄い始めた。おれの前へ来た一人の芸者が、あんた、なんぞ、唄いなはれ、と三味線を抱えたから、おれは唄わない、貴様唄ってみろと云ったら、金や太鼓でねえ、迷子の迷子の三太郎と、どんどこ、どんのちゃんちきりん。叩いて廻って逢われるものならば、わたしなんぞも、金や太鼓でどんどこ、どんのちゃんちきりんと叩いて廻って逢いたい人がある、と二た息にうたって、おおしんどと云った。おおしんどなら、もっと楽なものをやればいいのに。
すると、いつの間にか傍へ来て坐った、野だが、鈴ちゃん逢いたい人に逢ったと思ったら、すぐお帰りで、お気の毒さまみたようでげすと相変らず噺し家みたような言葉使いをする。知りまへんと芸者はつんと済ました。野だは頓着なく、たまたま逢いは逢いながら……と、いやな声を出して義太夫の真似をやる。おきなはれやと芸者は平手で野だの膝を叩いたら野だは恐悦して笑ってる。この芸者は赤シャツに挨拶をした奴だ。芸者に叩かれて笑うなんて、野だもおめでたい者だ。鈴ちゃん僕が紀伊の国を踴るから、一つ弾いて頂戴と云い出した。野だはこの上まだ踴る気でいる。
向うの方で漢学のお爺さんが歯のない口を歪めて、そりゃ聞えません伝兵衛さん、お前とわたしのその中は……とまでは無事に済したが、それから? と芸者に聞いている。爺さんなんて物覚えのわるいものだ。一人が博物を捕まえて近頃こないなのが、でけましたぜ、弾いてみまほうか。よう聞いて、いなはれや――花月巻、白いリボンのハイカラ頭、乗るは自転車、弾くはヴァイオリン、半可の英語でぺらぺらと、I am glad to see you と唄うと、博物はなるほど面白い、英語入りだねと感心している。
山嵐は馬鹿に大きな声を出して、芸者、芸者と呼んで、おれが剣舞をやるから、三味線を弾けと号令を下した。芸者はあまり乱暴な声なので、あっけに取られて返事もしない。山嵐は委細構わず、ステッキを持って来て、踏破千山万岳烟と真中へ出て独りで隠し芸を演じている。ところへ野だがすでに紀伊の国を済まして、かっぽれを済まして、棚の達磨さんを済して丸裸の越中褌一つになって、棕梠箒を小脇に抱い込んで、日清談判破裂して……と座敷中練りあるき出した。まるで気違いだ。
おれはさっきから苦しそうに袴も脱がず控えているうらなり君が気の毒でたまらなかったが、なんぼ自分の送別会だって、越中褌の裸踴まで羽織袴で我慢してみている必要はあるまいと思ったから、そばへ行って、古賀さんもう帰りましょうと退去を勧めてみた。するとうらなり君は今日は私の送別会だから、私が先へ帰って
Translation
HI
फिर उसने आँखों से बिजली-सी चमक दिखाई। मैंने उसके तार के जवाब में तर्जनी उंगली से पलक खींचकर मुँह बना दिखाया।
लाल शर्ट के अपनी सीट पर लौटने का इंतज़ार किए बिना ही पहाड़ी तूफ़ान झट से खड़ा हो गया। मुझे इतनी खुशी हुई कि बिना सोचे-समझे मैंने तालियाँ बजा दीं। लेकिन फिर लोमड़ी सहित सभी ने मेरी ओर देखा, जिससे मैं थोड़ा असहज हो गया। मैं सोच रहा था कि पहाड़ी तूफ़ान क्या कहेगा, तब वह बोला – "अभी-अभी प्रिंसिपल और ख़ासकर उप-प्रिंसिपल ने कोगा के तबादले पर बहुत अफ़सोस ज़ाहिर किया, लेकिन मेरी राय इससे उलट है। मैं चाहता हूँ कि कोगा यहाँ से जल्द-से-जल्द चले जाएँ। नोबेओका दूर-दराज़ का इलाक़ा है; यहाँ की तुलना में वहाँ सुख-सुविधाओं में कमी तो होगी। पर सुना है, वहाँ के रीति-रिवाज़ बड़े सादे हैं और सारे कर्मचारी-विद्यार्थी पुराने ज़माने की सरलता से परिपूर्ण हैं। मुझे विश्वास है कि वहाँ एक भी फ़ैशनपरस्त बदमाश नहीं होगा जो जी न चाहते हुए भी चापलूसी बरसाता हो, या खूबसूरत चेहरे से सज्जनों को फँसाता हो। इसलिए आप जैसा सौम्य और सज्जन पुरुष वहाँ अवश्य जन-साधारण का स्वागत पाएगा। मैं इस तबादले को कोगा की ख़ातिर बहुत ही शुभ मानता हूँ। अंत में मेरी यही इच्छा है कि जब आप नोबेओका में पदभार संभालें, तो वहाँ की किसी ऐसी सुशील महिला को चुनें, जिसमें एक सज्जन पुरुष की योग्य जीवनसंगिनी बनने के गुण हों, और शीघ्र ही एक सुखी घर बसा लें, ताकि वह अविश्वासी और चंचल स्त्री वास्तविकता में लज्जा से मर जाए।" फिर उसने दो-तीन बार "खँ-खँ" करते हुए ज़ोर से कंठ साफ़ किया और बैठ गया। मैंने फिर तालियाँ बजाना चाहा, पर यह सोचकर कि सब फिर मेरी ओर देखेंगे, तो मुझे बुरा लगेगा, इसलिए नहीं बजाया।
पहाड़ी तूफ़ान के बैठते ही अब मुरझाया जी उठे। वे बड़ी विनयता से अपनी सीट से जाकर कमरे की एकदम अंतिम सीट तक पहुँचे, वहाँ से सबको शिष्टतापूर्वक प्रणाम किया और कहने लगे, "इस बार निजी कारणों से मुझे क्यूशू जाना पड़ा है। आप सब शिक्षकों ने इस तुच्छ के लिए इतनी भव्य विदाई-सभा आयोजित की, यह मेरे लिए हृदयस्पर्शी है। ख़ासकर अभी प्रिंसिपल और उप-प्रिंसिपल तथा और सज्जनों के विदाई-वचन सुनकर मैं अत्यंत कृतज्ञ हुआ हूँ और उन्हें हृदय से स्वीकार करता हूँ। अब मैं दूर जा रहा हूँ, फिर भी सबसे प्रार्थना है कि पहले की तरह मुझ पर अपना स्नेह-आदर बनाए रखें।" यह कहकर वे आदर से झुकते हुए अपनी सीट पर लौट आए। मुरझाया जी इतने भले-से सज्जन हैं कि उनके स्वभाव की कोई थाह नहीं लगती। जो प्रिंसिपल और उप-प्रिंसिपल उन्हें इतना बेवक़ूफ़ बना रहे हैं, उन्हीं के प्रति वह इतने आदर से धन्यवाद जताते हैं। वह अगर सिर्फ़ रस्मी धन्यवाद कर रहे होते, तो बात दूसरी थी, लेकिन उनके ढंग से, बोलने के तरीक़े से और चेहरे के भाव से लगता है कि वह सचमुच दिल से कृतज्ञ हैं। जब ऐसा सज्जन आपको सच्चे मन से धन्यवाद करता है, तो सहानुभूति होती है और शर्म से मुँह लाल हो जाना चाहिए, मगर लोमड़ी और लाल शर्ट दोनों गंभीर होकर उसकी बात सुनते ही रहे।
अभिवादन खत्म होते ही, इधर भी 'चू', उधर भी 'चू' की आवाज़ें आने लगीं। मैंने भी नकल में शोरबा पीकर देखा, पर बेस्वाद था। क्षुधावर्धक में मछली की टिकिया तो लगी थी, पर वह काली-काली और बिगड़ी हुई चिकुवा जैसी थी। कच्ची मछली के टुकड़े भी सजे थे, पर इतने मोटे कि मानो टूना मछली को कच्चा खा रहे हों। फिर भी आस-पास के लोग बड़े चाव से उसको चबा-चबाकर स्वाद लेते हुए खा रहे थे। शायद उन्होंने कभी एदो-शैली का खाना नहीं खाया होगा।
कुछ देर में गरम शराब की बोतलों का आना-जाना बढ़ा, तो चारों ओर अचानक रौनक हो गई। यदाकू बड़ी विनम्रता से प्रधानाचार्य के सामने जाकर प्याला ले रहा है। घिनौना आदमी। उरानारी बारी-बारी से एक-एक को प्याला पिला रहा है; लगता है पूरा चक्कर लगाने का इरादा है। बड़ी मशक्कत है। उरानारी मेरे पास आया, हकामा की सिलवटें ठीक करते हुए बोला, 'आपसे एक प्याला ले लूँ।' तब मैंने भी झेंपते हुए, पतलून में ही सावधान होकर, उसे एक प्याला पिला दिया। मैंने कहा, 'इतने कष्ट से आए और जल्दी ही विदा हो जाएँगे, यह बड़े दुख की बात है। आपके जाने की तारीख कब है? मैं तो ज़रूर आपको समुद्र-किनारे तक छोड़ने आऊँगा।' उरानारी ने उत्तर दिया, 'नहीं, आप इतने व्यस्त रहते हैं, इसकी कोई ज़रूरत नहीं है।' उरानारी चाहे कुछ भी कहे, मेरा इरादा तो स्कूल की छुट्टी लेकर भी उसे विदा करने जाने का ही है।
उसके एक घंटे के भीतर मेहफिल काफ़ी बिगड़ चुकी थी। एक-दो ऐसे भी निकल आए, जिनकी ज़ुबान लड़खड़ाने लगी थी—'अरे, एक और प्याला लो, अरे, मैंने तो कहा था कि तुम पीओ...' थोड़ी ऊब लगने पर मैं शौचालय गया और पुराने ज़माने का बगीचा तारों की रोशनी में टकटकी लगाकर देखता रहा। इतने में यामाराशी आ गया। 'कैसा रहा मेरा भाषण? अच्छा लगा ना?' वह बड़ा फूला हुआ था। मैंने कहा, 'पूरी तरह सहमत हूँ, पर एक बात पसंद नहीं आई।' उसने पूछा, 'किस बात से असहमत?'
'तुमने कहा था ना—नोबेओका में ऐसे फैशनपरस्त बदमाश नहीं हैं, जो सुंदर चेहरे दिखाकर लोगों को फँसाएँ?'
'हाँ।'
'सिर्फ़ फैशनपरस्त बदमाशों से ही काम नहीं चलता।'
"तो फिर क्या कहूँ?"
"उसे फैशनपरस्त बदमाश, धोखेबाज़, जालसाज़, मक्कार, चार्लटन, उड़न गिलहरी, मुखबिर – और ऐसा आदमी कह दो जो 'वूँ-वूँ' भौंके तो कुत्ते के बराबर हो।"
"मेरी ज़ुबान इतनी नहीं चलती। तुम वाक्पटु हो। पहली बात, तुम बहुत सारे शब्द जानते हो। फिर भी तुम भाषण नहीं दे सकते, यही अचरज की बात है।"
"अरे, ये शब्द मैंने झगड़े के समय इस्तेमाल करने के लिए सावधानी से रख छोड़े हैं। भाषण की बात आए तो ये मुँह से नहीं निकलते।"
"हाँ? पर धड़ल्ले से निकलते हैं। ज़रा एक बार फिर दिखा तो।"
"जितनी बार चाहो, कर दिखाऊँगा। – फैशनपरस्त बदमाश, धोखेबाज़, जालसाज़..." कहते-कहते वह रुका, क्योंकि बरामदे में तड़तड़ कदमों की आवाज़ सुनाई दी और दो आदमी लड़खड़ाते हुए दौड़ते चले आए।
"तुम दोनों ने बहुत बुरा किया – भागने की क्या बात! – जब तक मैं मौजूद हूँ, तुम्हें भागने नहीं दूँगा। लो, पी लो। – जालसाज़? – मज़ेदार, जालसाज़ मज़ेदार है। – लो, पी लो।" यह कहकर वह मुझे और यामाराशी को ज़ोर से खींचने लगा। असल में ये दोनों शौचालय आए थे, पर नशे की वजह से शौचालय में जाना भूल गए और हमें खींच ले गए। शराबी को जहाँ नज़र पड़ती है, वहीं काम निकाल लेता है और पिछली बात तुरंत भूल जाता है।
"लो, सज्जनो, जालसाज़ को खींच लाया हूँ। अब इसे पिलाओ। जालसाज़ को खूब पिलाओ। तुम भागना मत।" यह कहकर उसने मुझे, हालाँकि मैं भाग नहीं रहा था, दीवार की तरफ़ दबा दिया। चारों ओर नज़र दौड़ाई तो खाने की चौकियों पर एक भी अच्छा पकवान नहीं बचा था। कुछ लोग अपना हिस्सा साफ़ चट करके दस-बारह गज़ दूर कहीं और छापा मारने चले गए थे। हेडमास्टर कब लौट गए, पता ही नहीं चला; उनका कहीं अता-पता नहीं था।
तभी "क्या यही बैठक है?" कहती हुई तीन-चार गीशा अन्दर आईं। मुझे भी थोड़ा आश्चर्य हुआ, पर मैं दीवार से चिपका हुआ था, इसलिए खड़ा-खड़ा देखता रहा। तभी लाल कमीज़, जो अब तक खंभे से टेक लगाए अपनी उसी एम्बर पाइप को बड़े गर्व से मुँह में दबाए बैठा था, अचानक उठा और कमरे से बाहर निकलने लगा। सामने से आती गीशाओं में से एक – सबसे छोटी और सबसे सुंदर – उससे मिलते समय मुस्कुराते हुए अभिवादन करने लगी। दूर से सुनाई नहीं दिया, पर लगता है उसने "अरे, शुभ संध्या" जैसा कुछ कहा। लाल कमीज़ ने अनजान बनकर बाहर चला गया और फिर नज़र ही नहीं आया। ज़्यादातर वह हेडमास्टर के पीछे-पीछे घर लौट गया।
गीशाओं के आते ही कमरे में एकाएक रौनक आ गई। ऐसा लगा मानो सबने मिलकर जयघोष करके उनका स्वागत किया हो – इतना शोर मच गया। और किसी ने लड़की को दबोच लिया। उसकी चीख़ इतनी ऊँची थी मानो तलवार निकालने का अभ्यास हो रहा हो। और कहीं कोई मुट्ठियों का खेल खेल रहा था।
"हाय, हाय!" कहकर पागलों की तरह दोनों हाथ हिलाने का उनका अंदाज़ डार्क मंडली की कठपुतलियों से कहीं बेहतर था। दूसरे कोने में कोई साके का प्याला भरते हुए शराब का गिलास हिला-हिलाकर दिखा रहा था और फिर "ये शराब है, शराब!" कहकर अपनी बात सुधार रहा था। सचमुच, यह शोर-शराबा बर्दाश्त से बाहर था। इस सबके बीच केवल उरानारी ही था जो हाथ में कुछ न होने के कारण सिर झुकाए किसी गहरे विचार में डूबा बैठा था। उसने अपने लिए यह विदाई समारोह इसलिए नहीं करवाया था कि उसके तबादले पर किसी को अफ़सोस था। सब लोग तो सिर्फ़ शराब पीने और मौज-मस्ती करने के लिए जुटे थे। और वह अकेला इसलिए तड़प रहा था क्योंकि उसके हाथ में कुछ था ही नहीं। ऐसे विदाई समारोह से तो यही बेहतर था कि कोई समारोह ही न रखा जाए।
थोड़ी देर बाद सबने बेतुकी आवाज़ों में कुछ गाना शुरू कर दिया। मेरे सामने आई एक गीशा ने शामिसेन गोद में लेकर कहा, "आप कुछ तो गाइए।" मैंने कहा, "मैं नहीं गाता, तुम ही गाकर सुनाओ।" तो वह फौरन दो साँसों में गा उठी:
"न घंटा, न ढोल, भटका-भटका सांतारो,
धड़ाधड़ धड़ाका झनाक-झनाक।
अगर वह घूम-घूमकर बाजा बजाते हुए मिल जाए,
तो मैं भी, न घंटा, न ढोल,
धड़ाधड़ धड़ाका झनाक-झनाक बजाती हुई घूमकर उससे मिलना चाहूँ।"
फिर बोली, "वाह, कितनी थकान हुई!" अगर इतनी थकान होती है, तो कुछ और आसान गाना ही क्यों नहीं चुना?
इतने में नोदा, जो पता नहीं कब आकर मेरे पास बैठ गया था, अपनी हमेशा वाली कहानी सुनाने वाली बोली में बोला, "लगता है, सुज़ु-चान को अपने प्यारे से मिलना हुआ, लेकिन बस मिलना हुआ और तुरंत वापसी। कितने अफ़सोस की बात है, ऐसा लगता है न?" गीशा ने मुँह फुलाकर कहा, "मुझे क्या पता!" नोदा को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा और उसने बुरी आवाज़ में गिदायू की नकल करते हुए कहना शुरू किया, "बिछड़कर मिलना हुआ, पर मिलकर..." गीशा ने तमाचा-सा जड़ते हुए नोदा के घुटने पर थप्पड़ मारा, तो नोदा खुश होकर हँसने लगा। यह वही गीशा थी जो अकाशात्सु को सलाम कर चुकी थी। गीशा के थप्पड़ पर हँसना — नोदा भी कितना भोला-भाला आदमी है! सुज़ु-चान ने कहा, "नोदा-सान, मैं 'की-नो-कुनि' नाचूँगा, तुम एक बार बजा दो।" यानी नोदा अभी भी नाचने के मूड में बैठा था।
दूसरी तरफ़ कन्फ्यूशियस विद्वान बूढ़े ने अपने बिना दाँत वाले मुँह को बिचकाकर कहा, "वह सुनाई नहीं दिया, देम्बे-सान, तुम्हारे और मेरे बीच वह... यह तक ठीक-ठाक कह लिया, फिर 'उसके बाद?' कहकर गीशा से पूछने लगा। बूढ़े लोगों की याददाश्त कितनी कमज़ोर होती है! एक शख्स ने हाकुबुत्सु को पकड़कर कहा, "इन दिनों एक नया गाना बना है, क्या बजाकर सुनाऊँ? ध्यान से सुनिए — 'हाना-गेत्सु-माकी, सफ़ेद रिबन वाला आधुनिक सिर, सवारी है साइकिल, बजाती है वायलिन, अधकचरी अंग्रेज़ी में फर्राटेदार — I am glad to see you' — जब उसने यह गाया, तो हाकुबुत्सु ने तारीफ़ करते हुए कहा, "सचमुच मज़ेदार है! इसमें अंग्रेज़ी भी है!"
यामाराशी ने बेतहाशा ज़ोर से 'गीशा, गीशा!' चिल्लाकर हुक्म दिया, 'मैं तलवार-नृत्य करूँगा, इसलिए शामिसेन बजाओ।' इतनी उजड्ड आवाज़ सुनकर गीशा सन्न रह गई और उसने कोई जवाब न दिया। यामाराशी को परवाह नहीं थी। वह अपनी छड़ी लाया और 'पार कर आया हज़ार पर्वत, दस हज़ार शिखरों की धुंध' कहता हुआ बीच में जा खड़ा हुआ और अकेले अपना करतब दिखाने लगा। तभी नोदा, जो 'की नो कूनी' निपटा चुका था, 'कप्पोरे' भी निपटा चुका था, 'ताक़े पे दारुमा' भी ख़त्म कर चुका था, अब बिल्कुल नंगा, सिर्फ़ एक एत्चू लंगोट पहने, बगल में ताड़ की झाड़ू दबाए, 'चीन-जापान वार्ता टूट गई…' कहता हुआ पूरे कमरे में चहलने लगा। एकदम पागल है।
मुझे उरानारी पर बहुत तरस आ रहा था, क्योंकि वह देर से तकलीफ़ में बैठा था और हाकामा भी नहीं उतारी थी। मैंने सोचा—भले ही यह उसकी अपनी विदाई-पार्टी ही क्यों न हो, लंगोट में नग्न नाच देखने के लिए उसे हाओरी-हाकामा पहने सब्र से बैठे रहने की ज़रूरत नहीं। यही सोचकर मैं उसके पास गया और बोला, 'कोगा साहब, अब चलें।' इस पर उरानारी ने कहा, 'आज मेरी विदाई है, तो मैं पहले लौटूँ…'