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【テキスト中に現れる記号について】
:ルビ
(例)検非違使
:ルビの付く文字列の始まりを特定する記号
(例)昨年の秋鳥部寺の
:入力者注 主に外字の説明や、傍点の位置の指定
(例)(大正十年十二月)
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検非違使に問われたる木樵りの物語
さようでございます。あの死骸を見つけたのは、わたしに違いございません。わたしは今朝いつもの通り、裏山の杉を伐りに参りました。すると山陰の藪の中に、あの死骸があったのでございます。あった処でございますか? それは山科の駅路からは、四五町ほど隔たって居りましょう。竹の中に痩せ杉の交った、人気のない所でございます。
死骸は縹の水干に、都風のさび烏帽子をかぶったまま、仰向けに倒れて居りました。何しろ一刀とは申すものの、胸もとの突き傷でございますから、死骸のまわりの竹の落葉は、蘇芳に滲みたようでございます。いえ、血はもう流れては居りません。傷口も乾いて居ったようでございます。おまけにそこには、馬蠅が一匹、わたしの足音も聞えないように、べったり食いついて居りましたっけ。
太刀か何かは見えなかったか? いえ、何もございません。ただその側の杉の根がたに、縄が一筋落ちて居りました。それから、――そうそう、縄のほかにも櫛が一つございました。死骸のまわりにあったものは、この二つぎりでございます。が、草や竹の落葉は、一面に踏み荒されて居りましたから、きっとあの男は殺される前に、よほど手痛い働きでも致したのに違いございません。何、馬はいなかったか? あそこは一体馬なぞには、はいれない所でございます。何しろ馬の通う路とは、藪一つ隔たって居りますから。
検非違使に問われたる旅法師の物語
あの死骸の男には、確かに昨日遇って居ります。昨日の、――さあ、午頃でございましょう。場所は関山から山科へ、参ろうと云う途中でございます。あの男は馬に乗った女と一しょに、関山の方へ歩いて参りました。女は牟子を垂れて居りましたから、顔はわたしにはわかりません。見えたのはただ萩重ねらしい、衣の色ばかりでございます。馬は月毛の、――確か法師髪の馬のようでございました。丈でございますか? 丈は四寸もございましたか? ――何しろ沙門の事でございますから、その辺ははっきり存じません。男は、――いえ、太刀も帯びて居れば、弓矢も携えて居りました。殊に黒い塗り箙へ、二十あまり征矢をさしたのは、ただ今でもはっきり覚えて居ります。
あの男がかようになろうとは、夢にも思わずに居りましたが、真に人間の命なぞは、如露亦如電に違いございません。やれやれ、何とも申しようのない、気の毒な事を致しました。
検非違使に問われたる放免の物語
わたしが搦め取った男でございますか? これは確かに多襄丸と云う、名高い盗人でございます。もっともわたしが搦め取った時には、馬から落ちたのでございましょう、粟田口の石橋の上に、うんうん呻って居りました。時刻でございますか? 時刻は昨夜の初更頃でございます。いつぞやわたしが捉え損じた時にも、やはりこの紺の水干に、打出しの太刀を佩いて居りました。ただ今はそのほかにも御覧の通り、弓矢の類さえ携えて居ります。さようでございますか? あの死骸の男が持っていたのも、――では人殺しを働いたのは、この多襄丸に違いございません。革を巻いた弓、黒塗りの箙、鷹の羽の征矢が十七本、――これは皆、あの男が持っていたものでございましょう。はい。馬もおっしゃる通り、法師髪の月毛でございます。その畜生に落されるとは、何かの因縁に違いございません。それは石橋の少し先に、長い端綱を引いたまま、路ばたの青芒を食って居りました。
この多襄丸と云うやつは、洛中に徘徊する盗人の中でも、女好きのやつでございます。昨年の秋鳥部寺の賓頭盧の後の山に、物詣でに来たらしい女房が一人、女の童と一しょに殺されていたのは、こいつの仕業だとか申して居りました。その月毛に乗っていた女も、こいつがあの男を殺したとなれば、どこへどうしたかわかりません。差出がましゅうございますが、それも御詮議下さいまし。
**पुलिस कमिश्नर के समक्ष लकड़हारे का बयान**
जी हाँ, वह शव मैंने ही पाया था। आज सुबह मैं हमेशा की तरह पीछे वाली पहाड़ी पर देवदार काटने गया था। तभी पहाड़ी की छाया में झाड़ियों के भीतर वह लाश मिली। वह कहाँ थी? वह यामाशिना के पथ से लगभग चार-पाँच सौ मीटर दूर रही होगी। वह बाँस और कुछ पतले देवदारों के बीच की एक सुनसान जगह थी।
लाश पीठ के बल पड़ी हुई थी। उसने हल्के नीले रंग का चोगा पहना हुआ था और सिर पर राजधानी की शैली की मटमैली काली टोपी थी। कहने को तो एक ही वार था, पर वह छाती पर घातक चोट थी, इसलिए लाश के चारों ओर बाँस के गिरे पत्ते सुर्ख लाल रंग में भीगे हुए लगते थे। नहीं, खून अब नहीं बह रहा था। ज़ख्म सूख चुका था। इसके अलावा वहाँ एक घोड़ा-मक्खी ऐसे चिपकी हुई थी मानो उसे मेरे कदमों की आहट भी नहीं सुनाई देती।
तलवार या कोई और चीज़ दिखाई दी? नहीं, कुछ भी नहीं। बस उसके पास देवदार की जड़ के पास एक रस्सी पड़ी थी। और — हाँ, हाँ, रस्सी के अलावा एक कंघी भी थी। लाश के आस-पास बस यही दो चीज़ें थीं। पर घास और बाँस के सूखे पत्ते चारों ओर रौंदे गए थे, इसलिए निश्चय ही उस आदमी ने मारे जाने से पहले बड़ी जबरदस्त लड़ाई लड़ी होगी। क्या, घोड़ा नहीं था? उस जगह तो घोड़े का जाना बिल्कुल असंभव है। आखिर घोड़ों के आने-जाने के रास्ते से वह एक झाड़ी के पार थी।
मैं उस मृत पुरुष से कल अवश्य मिला था। कल—हाँ, दोपहर के लगभग। स्थान था—सेकीयामा से यमाशीना की ओर जाते हुए मार्ग पर। वह पुरुष घोड़े पर सवार एक स्त्री के साथ सेकीयामा की ओर पैदल आ रहा था। स्त्री ने मुख-घूँघट डाल रखा था, अतः उसका चेहरा मुझे दिखाई नहीं दिया। दिखाई दिया केवल उसके वस्त्र का रंग—मानो हगी-पुष्प के वर्ण का परतदार वस्त्र हो। घोड़ा चाँदनी-रंग का था—निश्चय ही भिक्षु-केशवाला घोड़ा प्रतीत होता था। ऊँचाई? क्या उसकी ऊँचाई चार सुन भी रही होगी? — आखिर मैं तो भिक्षु ठहरा, अतः उस विषय में मुझे कुछ स्पष्ट ज्ञात नहीं। वह पुरुष—नहीं, उसकी कमर में तलवार भी बँधी थी, और धनुष-बाण भी साथ रखे हुए थे। विशेषतः काले रँगे तरकश में बीस से अधिक युद्ध-बाण भरे हुए थे—यह मुझे आज भी स्पष्ट स्मरण है।
मैंने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि वह पुरुष ऐसी दशा में पहुँचेगा। सचमुच, मानव-जीवन ओस के समान और विद्युत के समान ही होता है। हाय! कहने को शब्द नहीं—यह कितनी दयनीय घटना घटी।
**शाही पुलिस द्वारा पूछताछ किए गए मुक्त-बंदी की कथा**
क्या मैंने जिस पुरुष को बंदी बनाया था, वही है? हाँ, यह निश्चय ही ताजोमारू नाम का नामी डाकू है। परंतु जब मैंने इसे पकड़ा, तब यह—घोड़े से गिरा होगा—अवातागुची के पत्थर के पुल पर कराह रहा था। समय? पिछली रात का प्रथम प्रहर था। जब मैं एक बार इसे पकड़ नहीं सका था, तब भी यह इसी गहरे नीले सुइकान वस्त्र में था और नक्काशी