清水寺に来れる女の懺悔
-- उस गहरे नीले जलवस्त्र पहने पुरुष ने, मुझ पर अत्याचार करने के बाद, बँधे हुए पति की ओर देखकर, उपहास से हँसा। मेरे पति को कितनी निराशा हुई होगी! परन्तु, वे जितना छटपटाते, उनके सारे शरीर पर कसे रस्सियाँ उतनी ही और गहरी चुभती जातीं। मैंने अनायास ही पति की ओर, लड़खड़ाती हुई दौड़ने का प्रयास किया। नहीं, दौड़ने की चेष्टा की। परन्तु उस पुरुष ने उसी क्षण मुझे वहीं लात मारकर गिरा दिया। ठीक उसी क्षण। मैंने पति की आँखों में, एक अवर्णनीय चमक देखी। अवर्णनीय, -- उन आँखों को याद करते ही, आज भी मेरे शरीर में कम्पन उत्पन्न हो जाता है। मुँह से एक शब्द भी न बोल पाने वाले पति ने, उस क्षण की आँखों में, अपना सारा भाव व्यक्त कर दिया। परन्तु उस चमक में जो झलक रहा था, वह न क्रोध था, न करुणा, -- केवल मेरे प्रति तिरस्कार से भरा, एक शीतल प्रकाश था, है न? मैं उस पुरुष की लात से अधिक, उस आँखों के रंग से आहत हुई, अनजाने में कुछ चीख पड़ी, और अन्ततः मूर्च्छित हो गई। उसी बीच किसी तरह होश आने पर देखा, तो वह गहरे नीले जलवस्त्र वाला पुरुष कहीं जा चुका था। पीछे केवल सुगन्धित देवदार के वृक्ष के तने के पास, मेरे पति बँधे हुए थे। मैं बाँस की सूखी पत्तियों पर, किसी तरह शरीर उठाकर, पति के मुख की ओर देखती रही। परन्तु पति की आँखों का भाव, पहले से ज़रा भी नहीं बदला था। उनमें वही शीतल तिरस्कार, और उसके भीतर घृणा का रंग दिखाई दे रहा था। लज्जा, करुणा, क्रोध, -- उस समय मेरे मन की दशा, मैं कैसे व्यक्त करूँ, समझ नहीं आता। मैं लड़खड़ाती हुई उठकर, पति के समीप गई। "आप। अब तो यह दशा हो गई है, अब मैं आपके साथ नहीं रह सकती। मैंने एक ही बार में मर जाने का निश्चय किया है। परन्तु, -- परन्तु आप भी मर जाइए। आपने मेरी लज्जा देख ली है। मैं इस अवस्था में आपको अकेला छोड़कर नहीं जा सकती।" मैंने प्राणपण से, यही कुछ कहा। फिर भी पति केवल घृणा से, मेरी ओर ताकते रहे। मैंने फटे जा रहे हृदय को सम्भालते हुए, पति की तलवार खोजी। परन्तु, निश्चय ही वह उस चोर ने छीन ली होगी, तलवार तो क्या, धनुष-बाण भी, झाड़ियों में नहीं मिले। परन्तु सौभाग्य से एक छोटा सा चाकू, मेरे पैरों के पास पड़ा मिल गया। उस चाकू को उठाकर, मैंने एक बार फिर पति से यह कहा। "तो, मैं आपकी जान ले लूँ। मैं भी तुरन्त आपका अनुसरण करूँगी।" इन शब्दों को सुनकर पति ने, अन्ततः अपने होंठ खोले।
बेशक, उसका मुँह बाँस की पत्तियों से भरा हुआ था, इसलिए ज़रा भी आवाज़ नहीं निकल रही थी। परन्तु यह देखते ही मैंने तुरंत वह शब्द पहचान लिया। मेरे पति ने मुझे तुच्छ समझते हुए केवल एक शब्द कहा था—'मुझे मार डालो।' मैंने लगभग अर्धचेतन अवस्था में, अपने पति के हल्के नीले वस्त्र के वक्ष पर छुरी धँसा दी।
इस बार भी मैं मूर्छित हो गई होऊँगी। जब किसी तरह मैंने इधर-उधर देखा, तो पति बँधा हुआ ही बहुत पहले प्राणहीन हो चुका था। उसके पीले पड़े चेहरे पर, बाँसों के साथ मिले देवदार के झुरमुट के ऊपर के आकाश से, अस्ताचलगामी सूर्य की एक किरण पड़ रही थी। मैंने सिसकियाँ दबाते हुए मृत शरीर की रस्सियाँ खोलकर फेंक दीं। फिर—फिर मेरा क्या हुआ? यह बताने की मुझमें अब सामर्थ्य नहीं है। जो भी हो, मैं मरने की शक्ति नहीं जुटा सकी। मैंने छुरी गले में भोंकने की, पहाड़ की तलहटी के तालाब में कूदने की, और भी कई तरह के प्रयत्न किए। पर जब तक मर नहीं पाई और इस प्रकार जीवित हूँ, यह भी गर्व की बात नहीं हो सकती। (उदास मुस्कान) मेरे जैसी भीरु को शायद महाकरुणामय अवलोकितेश्वर बोधिसत्व ने भी त्याग दिया है। किंतु जिसने अपने पति का वध किया, जो लुटेरों के हाथों दुष्कर्म का शिकार हुई, उस मुझे आखिर क्या करना चाहिए? आखिर मैं—मैं—(अचानक उग्र सिसकियाँ)
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