巫女の口を借りたる死霊の物語
—— डाकू पत्नी के साथ अनाचार करने के बाद वहीं बैठे-बैठे उसे तरह-तरह से दिलासा देने लगा। मैं निःसंदेह बोल नहीं सकता था; शरीर भी देवदार की जड़ों से बँधा हुआ था। किन्तु इसी बीच मैंने कई बार पत्नी की ओर आँख से इशारा किया। "इस आदमी की बात का कुछ भी विश्वास मत करना। जो कुछ कहे, उसे झूठ ही समझना," — मैं यही अर्थ पहुँचाना चाहता था। परन्तु पत्नी उदास-मन से बाँस के सूखे पत्तों पर बैठी रही, और टकटकी लगाए घुटनों को देखती रही। क्या यह नहीं लगता कि वह डाकू के वचनों में खोती जा रही थी? मैं ईर्ष्या से तड़प उठा। किन्तु डाकू बात को एक-से-दूसरी ओर बड़ी चतुराई से बढ़ाता जा रहा था। "एक बार तन मैला हो गया तो पति से नाता नहीं निभेगा। ऐसे पति के साथ पड़े रहने से अच्छा नहीं कि तुम मेरी पत्नी बन जाओ? मैंने तुम्हें प्यारा समझकर ही यह बड़ा अपराध भी कर डाला," — डाकू ने अन्ततः इतने दुस्साहस से यह बात भी कह दी।
डाकू की यह बात सुनकर पत्नी ने मोहित-सी होकर चेहरा उठाया। मैंने उस घड़ी जैसी सुन्दर पत्नी कभी नहीं देखी थी। किन्तु उसी सुन्दर पत्नी ने, उस समय बँधे हुए मुझे सामने रखकर, डाकू को क्या उत्तर दिया? मैं अन्तराभव में भटकता हुआ भी, जब-जब पत्नी का उत्तर स्मरण करता हूँ, ऐसा कभी नहीं हुआ कि क्रोध से न जला होऊँ। पत्नी ने सचमुच यह कहा — "तो मुझे कहीं भी ले चलो।" (दीर्घ मौन)
पत्नी का पाप केवल इतना ही नहीं है। यदि केवल इतना होता, तो मैं इस अँधेरे में इतना न सताता। किन्तु जब पत्नी स्वप्न के समान, डाकू का हाथ पकड़े झाड़ी के बाहर जाने लगी, तभी सहसा उसका चेहरा उतर गया, और उसने देवदार की जड़ों के पास बँधे मुझे उंगली दिखाकर कहा — "उसे मार डालो। जब तक वह जीवित है, मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकती।" — पत्नी पागल-सी होकर बार-बार चीख उठी — "उसे मार डालो।" — ये शब्द आँधी की तरह अब भी मुझे दूर अँधेरे की तह में सिर के बल गिरा देने का प्रयत्न करते हैं। क्या इतने घृणित वचन कभी किसी मनुष्य के मुँह से निकले हैं? क्या इतने अभिशप्त वचन कभी किसी मनुष्य के कानों को छुए हैं? क्या कभी इतने... — (एकाएक फूट पड़ती-सी हँसी) — वे शब्द सुनकर डाकू का भी रंग उड़ गया। "उसे मार डालो।" — ऐसा चीखती हुई पत्नी डाकू की बाँह से जा चिपटी। डाकू पत्नी को टकटकी लगाए देखता रहा; न "मार दूँगा" कहा, न "नहीं मारूँगा"। — यह सोचते-न-सोचते, पत्नी बाँस के सूखे पत्तों पर एक ही ठोकर में पटक दी गई। (फिर फूट पड़ती-सी हँसी) डाकू ने शान्त भाव से दोनों भुजाएँ मोड़कर मेरी ओर देखा — "उस औरत का क्या करने का इरादा है?
"मार डालूँ, या छोड़ दूँ? उत्तर केवल सिर हिलाकर दे दो। मार डालूँ?" — मैं केवल इन शब्दों के लिए भी चोर के पाप को क्षमा कर देना चाहता हूँ। (पुनः, दीर्घ मौन)
पत्नी, मेरे हिचकिचाने के बीच ही, कुछ चीख पड़ी और उससे पहले कि मैं समझ पाता, वह झाड़ियों के भीतर भाग गई। चोर ने भी क्षण भर में छलाँग लगाई, पर लगता है उसकी आस्तीन भी न पकड़ सका। मैं केवल किसी स्वप्न की भाँति, यह दृश्य देखता रहा।
चोर, पत्नी के भाग जाने के बाद, तलवार और धनुष-बाण उठाकर, केवल एक स्थान पर मेरी रस्सी काट दी। "अब मेरी बारी है।" — जब चोर झाड़ियों के बाहर, अपनी छाया छिपाकर जा रहा था, मैंने यही बड़बड़ाया, यह मुझे स्मरण है। उसके बाद सब ओर सन्नाटा था। नहीं, अभी भी किसी के रोने की आवाज़ आ रही है। मैंने रस्सी खोलते हुए, ध्यान से कान लगाकर सुना। पर, जब मैंने सुना तो पाया — वह आवाज़ मेरे ही रोने की नहीं थी क्या? (तीसरी बार, दीर्घ मौन)
मैंने अंततः देवदार के जड़ से, थकी-हारी देह उठाई। मेरे सामने पत्नी द्वारा गिराई गई एक छुरी चमक रही थी। मैंने उसे हाथ में लिया, और एक ही वार में अपनी छाती में भोंक दिया। कुछ कच्चे मांस का ढेला सा मेरे मुँह तक उमड़ आया। पर, पीड़ा ज़रा भी नहीं है। केवल छाती ठंडी पड़ते ही, चारों ओर और भी शांत हो गया। अह, कैसा सन्नाटा है! इस पहाड़ी आड़ की झाड़ियों के आकाश में, कोई चिड़िया चहचहाने नहीं आती। केवल देवदार और बाँस के अग्रभागों पर, उदास धूप तैर रही है। धूप, — वह भी धीरे-धीरे मद्धिम पड़ती जा रही है। — अब देवदार और बाँस भी नहीं दिखते। मैं वहीं गिरा पड़ा रहा, गहरे सन्नाटे में लिपटा हुआ।
उसी समय कोई, चुपके-चुपके पैर रखते हुए, मेरे पास आया। मैंने उस ओर देखना चाहा। पर, मेरे चारों ओर, तब तक हल्का अंधकार छा चुका था। किसी ने, — उस अदृश्य हाथ वाले ने, धीरे से मेरी छाती से छुरी निकाल ली। उसी क्षण मेरे मुँह में एक बार फिर रक्त की धार उमड़ आई। मैं उसी के बाद सदा के लिए, अंतराल के अंधकार में डूब गया।………
(दिसंबर, ताइशो दस)
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