十一 1
अगले दिन जब आँख खुली, तो सारे शरीर में असहनीय दर्द हो रहा था। बहुत दिनों से झगड़ा नहीं किया था, इसीलिए इतना असर हुआ है। बिस्तर पर पड़ा-पड़ा सोचने लगा कि इस हालत में शेखी तो नहीं बघारी जा सकती। तभी बुढ़िया शिकोकु अखबार लाकर तकिये के पास रख गई। सच कहूँ तो अखबार देखने का जी भी नहीं था, लेकिन मर्द इतनी-सी बात से हार माने, यह कैसे हो सकता है? मजबूरी में पेट के बल लेटकर लेटे-लिए ही पन्ना खोला तो हैरान रह गया। कल के झगड़े की खबर साफ छपी है। झगड़े की खबर छपी होने से हैरानी नहीं, मगर लिखा है कि मिडिल स्कूल के शिक्षक होत्ता और हाल में टोक्यो से आकर नियुक्त हुए अभिमानी फलाँ ने नेक छात्रों को भड़काकर यह हंगामा खड़ा किया, साथ ही मौके पर दोनों ने छात्रों को निर्देश दिए और मनमानी करते हुए शिक्षक-प्रशिक्षण विद्यालय के छात्रों पर हमला किया। फिर इसके आगे ऐसा मत भी जोड़ा है: हमारे प्रांत का मिडिल स्कूल पुराने समय से अपने अच्छे और सीधे स्वभाव की वजह से पूरे देश की ईर्ष्या का विषय रहा है। मगर दो हल्के-किस्म के बदमाशों ने हमारे स्कूल का वह विशेषाधिकार छीन लिया, और पूरे शहर के सामने यह बदनामी हुई। ऐसे में हमें आगे बढ़कर उनसे पूछताछ करनी ही चाहिए। हमें विश्वास है कि इससे पहले कि हम कदम उठाएँ, अधिकारी इन बदमाशों को उचित सजा देंगे, ताकि उन्हें फिर कभी शिक्षा-क्षेत्र में कदम रखने की जगह न मिले। और उन्होंने हर अक्षर पर काली बिंदी लगाकर ऐसा किया है जैसे हमें ताड़ना दे ही दी हो। मैंने बिस्तर पर पड़े-पड़े 'गोबर खाओ' कहा और झट से उछल खड़ा हुआ। अजीब बात है कि कुछ देर पहले तक सारे जोड़ों में बहुत दर्द था, पर उछलते ही वह सब ऐसे गायब हो गया जैसे कोई भूल ही गया हो।
मैंने अखबार को मरोड़कर आँगन में फेंक दिया। फिर भी जी नहीं भरा, इसलिए जान-बूझकर उसे पाखाने में ले जाकर गिरा आया। अखबार तो बेहूदा झूठ लिखते हैं। दुनिया में पूछो कौन सबसे बड़ा शेखीबाज़ है, तो अखबार के सिवा और कोई नहीं होगा। मुझे जो कुछ कहने का हक है, वह सब उधर से कह दिया गया है। और यह 'हाल में टोक्यो से आया अभिमानी फलाँ' क्या होता है? दुनिया में कोई 'फलाँ' नामक आदमी भी होता है? सोचो तो। मेरे पास भी एक पक्का कुल और नाम है। वंशावली देखनी हो तो तादा मित्सुनाका के बाद से सभी पूर्वजों को एक-एक करके तुम्हारे सामने झुका दूँ – मुँह धोने के बाद अचानक गाल में दर्द हुआ। बुढ़िया से आईना माँगा तो उसने पूछा, 'क्या आज सुबह का अखबार देख लिया?' मैंने कहा, 'पढ़कर पाखाने में फेंक आया। चाहिए तो जाकर उठा ला।' वह डरकर पीछे हट गई। आईने में चेहरा देखा तो कल की तरह वही घाव हैं। यह भी मेरा बड़े काम का चेहरा है। उस पर चेहरे पर घाव हुए और साथ में मुझे 'अभिमानी फलाँ' कहने की नौबत आई – यह बहुत हो गया।
आज के अखबार से तंग आकर स्कूल से छुट्टी कर ली, अगर यह कहा जाए तो जीवन भर की बदनामी होगी, इसलिए मैंने खाना खाया और सबसे पहले हाज़िर हो गया। जो भी निकलकर आता, मेरे चेहरे की तरफ देखकर हँसता। क्या हँसने की बात है? यह चेहरा तुम लोगों ने बनवाकर नहीं दिया। तभी नोदा आया। “अरे, कल तो बड़ी वीरता दिखाई – माननीय घाव मिला, है न?” शायद उसे विदाई समारोह वाली पिटाई का बदला लेने का मौका मिला समझ में आया था, इसलिए उसने खूब ताना मारा। मैंने कह दिया, “फ़ालतू बातें मत करो, जाकर अपना ब्रश ही चाटते रहो।” उस पर वह बोला, “अरे, यह तो मैं हैरान हो गया। लेकिन ज़रूर बहुत दर्द हो रहा होगा न?” तो मैंने चिल्लाकर कहा, “दर्द हो या न हो, यह मेरा चेहरा है। तुम्हारी क्या परवाह?” तब वह दूसरी ओर जाकर अपनी सीट पर बैठ गया, और वहाँ भी मेरे चेहरे की तरफ देखकर बगल वाले इतिहास के शिक्षक से कुछ कानाफूसी करके हँसता रहा।
फिर यामाराशी आया। यामाराशी की नाक तो सूजकर बैंगनी हो गई थी, ऐसा लगता था कि कुरेदने पर उसमें से पीब निकल पड़े। शायद अपने ही अभिमान की वजह से, उसे मेरे चेहरे से कहीं बुरी तरह मार पड़ी थी। मैं और यामाराशी पास-पास बैठते थे, पड़ोसी होने के कारण क़रीबी रिश्ता था, और ऊपर से हमारा डेस्क कमरे के दरवाज़े के ठीक सामने था, इसलिए किस्मत ही खराब थी। दो अजीब चेहरे इकट्ठे जमे थे। और लोग जब तनिक भी ऊबते, तो ज़रूर हमारी ही तरफ देखते। मुँह से कहते हैं, “क्या दुर्भाग्य है,” पर दिल में ज़रूर सोचते होंगे, “ये बेवक़ूफ़ हैं।” नहीं तो इस तरह आपस में सरगोशी करके खिसियानी हँसी हँसने की कोई वजह नहीं होती। जब मैं कक्षा में पहुँचा तो विद्यार्थियों ने तालियाँ बजाकर स्वागत किया। दो-तीन ने “टीचर ज़िन्दाबाद” कहा। समझ नहीं आया कि यह उत्साह है या मज़ाक़। जब मैं और यामाराशी इस तरह सबके ध्यान का केंद्र थे, मगर लाल कमीज़ हमेशा की तरह पास आकर बोला, “वाकई, बड़ा दुर्भाग्य हुआ। मुझे तुम लोगों के लिए बहुत खेद है। अखबार के लेख के बारे में प्रिंसिपल से विचार-विमर्श करके मैंने सुधार के लिए आवेदन करने की कार्यवाही शुरू कर दी है, इसलिए चिंता मत करो। मेरा भाई होरिता साहब को बुलाने गया था, इसी वजह से ऐसा हुआ, मुझे सचमुच शर्मिंदगी हो रही है। इस मामले में मैं आख़िर तक कोशिश करने का इरादा रखता हूँ, इसलिए तुम बुरा न मानना।” – ऐसी आधी माफ़ी जैसी बातें वह कहता रहा। तीसरे पीरियड में प्रिंसिपल अपने कमरे से बाहर निकले और बोले, “अखबार ने तो मुश्किल वाली बात लिख दी। काश मामला उलझ न जाए।” वे कुछ चिंतित लग रहे थे। मुझे कोई चिंता नहीं है। आगे चलकर अगर नौकरी से निकालना ही हुआ, तो निकाले जाने से पहले ही इस्तीफ़ा दे दूँगा।
परन्तु जब स्वयं की कोई गलती नहीं थी, तो अपनी ओर से हट जाने का मतलब होता शेखीबाज़ अख़बार वाले को और भी अधिक उत्तेजित करना। इसलिए मैंने सोचा कि अख़बार वाले से सुधार करवाकर ज़िद पर अड़कर नौकरी करते रहना ही उचित है। लौटते समय अख़बार वाले से बातचीत करने का विचार था, परन्तु यह सुनकर कि विद्यालय की ओर से निरस्तीकरण की कार्यवाही हो चुकी है, वह विचार छोड़ दिया।
मैं और यामाआराशी ने प्रधानाध्यापक और उपप्रधानाध्यापक से समय निकालकर सत्य बात स्पष्ट कर दी। दोनों ने निष्कर्ष निकाला कि यही बात होगी—अख़बार वाले को विद्यालय से द्वेष था, इसीलिए उसने जान-बूझकर ऐसा लेख छापा। रेडशर्ट हमारे कार्यों का स्पष्टीकरण देता हुआ कर्मचारी कक्ष में हर एक व्यक्ति के पास जा-जाकर बातें कर रहा था। विशेषकर, वह यह प्रचार कर रहा था कि उसके अपने भाई ने यामाआराशी को बहला-फुसलाकर बुलाया, यह उसी की भूल है। सभी कह रहे थे कि पूरा दोष अख़बार वाले का ही है, यह बड़ा अक्षम्य है, और आप दोनों सचमुच अभागे हैं।
लौटते समय यामाआराशी ने चेतावनी दी, "सुनो, रेडशर्ट धूर्त है। सावधान न रहे तो वह तुम्हें नुकसान पहुँचा देगा।" मैंने कहा, "वह तो पहले से ही धूर्त है, आज से धूर्त नहीं बना है।" तब उसने समझाया, "क्या तुमने अभी तक ध्यान नहीं दिया? कल जान-बूझकर हमें बुलाकर झगड़े में उलझाना उसकी चाल थी।" सचमुच, मैंने उस हद तक नहीं सोचा था। यामाआराशी भले ही कठोर दिखता है, परन्तु मुझसे अधिक बुद्धिमान है—यह सोचकर मैं उसकी प्रशंसा करने लगा।
"इस तरह हमसे झगड़ा करवाकर उसने तुरंत बाद में अख़बार वाले से सम्पर्क किया और वह लेख छपवाया। वह सचमुच बड़ा धूर्त है।"
"अख़बार तक रेडशर्ट का प्रभाव! यह तो आश्चर्य की बात है। परन्तु अख़बार वाला रेडशर्ट की कही बात इतनी आसानी से मान लेगा?"
"मानने की आवश्यकता ही क्या है? अख़बार वालों में उसका कोई मित्र हो तो बात बन जाती है।"
"क्या उसके मित्र हैं?"
"न हों तो भी कोई कठिनाई नहीं। झूठ बोलकर कह दे कि वास्तव में यही हुआ है—तो वे तुरंत लिख देते हैं।"
"यह तो बहुत बुरी बात है। यदि सचमुच यह रेडशर्ट की चाल है, तो इस घटना के कारण हमें नौकरी से निकाला भी जा सकता है।"
"हालात बिगड़े तो नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है।"
"तो फिर कल ही मैं त्यागपत्र देकर तुरंत टोक्यो लौट जाऊँगा। ऐसी नीच जगह पर भला-चाहा करके भी रहना मुझे स्वीकार नहीं।"
"तुम्हारे त्यागपत्र से रेडशर्ट को कोई कष्ट नहीं होगा।"
"यह भी सही है। तो फिर किस बात से उसे कष्ट होगा?"
"ऐसे धूर्त व्यक्ति के सभी कार्य इस प्रकार योजनाबद्ध होते हैं कि सबूत न मिले, किसी भी तरह सबूत न मिले। इसलिए उसका खंडन करना बहुत कठिन है।"
"यह तो बड़ी मुश्किल बात है। तो फिर हमें झूठा दोष ही लगना पड़ेगा। यह बिल्कुल उचित नहीं है। क्या आकाश में न्याय है या नहीं?"
"चलो, एक-दो दिन और देख लेते हैं। यदि बात बिगड़ जाए, तो गरम पानी के सोते वाले क़स्बे में जाकर उसे दबाना ही एकमात्र उपाय होगा।"
"झगड़े के मामले को झगड़े के मामले के रूप में?"
"हाँ, वही।"
"हम अपनी तरफ़ से उनकी कमज़ोर जगह दबोच लेंगे।" "वह भी अच्छा है। मैं चालबाज़ी में कच्चा हूँ, इसलिए सारा मामला तुम्हारे हवाले। मौक़ा पड़ने पर मैं कुछ भी करने को तैयार हूँ।"
इस तरह मैं और साही अलग हुए। अगर लाल कमीज़ ने सचमुच साही के अनुमान के मुताबिक काम किया हो, तो वह बड़ा ही नीच आदमी है। उसे अक़्ल के ज़ोर से हराना हरगिज़ मुमकिन नहीं। आख़िरकार तो बाहुबल ही काम आ सकता है। इसीलिए तो दुनिया में जंग कभी नहीं मिटती। आदमियों के बीच भी आख़िरी फ़ैसला ताक़त ही करती है।
अगले दिन अख़बार के आने की राह न सही गई। खोलकर देखा तो सुधार तो दूर, खंडन-वापसी भी कहीं नहीं थी। स्कूल जाकर लोमड़ी से ताकीद की, तो उसने कहा, कल तक निकाल देंगे। अगले दिन छः नंबर की छोटी-सी टाइप में एक छोटा-सा खंडन छपा। मगर अख़बार वालों ने सुधार ज़ाहिर है नहीं किया। फिर प्रिंसिपल से बात की तो जवाब मिला कि इससे ज़्यादा और कोई कार्यवाही नहीं हो सकती। प्रिंसिपल तो लोमड़ी जैसी सूरत लिए, फ्रॉक पहने तड़क-भड़क करता है, मगर है बिल्कुल बेबस। एक देहाती अख़बार तक से, जिसने झूठा लेख छापा, माफ़ी नहीं करा सकता। इतना गुस्सा आया कि मैंने कहा, तो फिर मैं अकेला जाकर संपादक से बात करूँगा। वह बोला, यह मत करना। तुम बात करने जाओगे तो वे तुम्हारी और बदनामी करेंगे। ख़ुलासा यह कि अख़बार में छप चुकी बात, चाहे झूठ हो या सच, उस पर कुछ किया नहीं जा सकता। उसे जाने देने के सिवा कोई चारा नहीं। उसने ठीक वैसे ही उपदेश दिया जैसे कोई साधु-संन्यासी समझा रहा हो। अगर अख़बार ऐसी चीज़ है, तो उसे जितनी जल्दी तोड़-फोड़ डालें, उतना ही हमारा फ़ायदा। अख़बार में छपना और कीचड़ वाले कछुए के काटे जाना बराबर है—यह बात मैंने आज इसी वक़्त लोमड़ी की व्याख्या से पहली बार जानी।
उसके बाद कोई तीन दिन बीते होंगे कि एक दोपहर साही आगबबूला होकर आया। बोला, अब मौक़ा आ गया है, मैं अपनी तय की हुई योजना अमल में लाऊँगा। मैंने कहा, अच्छा, तो मैं भी शामिल हूँ; और तुरंत उसके गिरोह में जा मिला। मगर साही ने सिर हिलाकर कहा, तुम बेहतर यही करो कि इसमें मत पड़ो। मैंने कारण पूछा, तो उसने पूछा, क्या तुम्हें प्रिंसिपल ने बुलाकर इस्तीफ़ा देने को कहा है? मैंने कहा, नहीं। तुम्हें? वह बोला, आज मुझे प्रिंसिपल के कमरे में बुलाकर कहा गया—'मुझे बहुत अफ़सोस है, मगर हालात ऐसे हैं कि तुम्हें फ़ैसला करना होगा।'
"यह कोई इंसाफ़ नहीं है। लोमड़ी ने शायद पेट पर इतनी थपकियाँ बजाईं कि उसकी तोंद उलट गई। तुम और मैं साथ-साथ जीत की दावत में गए, साथ-साथ कोची की चमकती-दमकती नाच देखी, और साथ-साथ उस झगड़े को छुड़ाने में आगे बढ़े थे, है न? अगर इस्तीफ़ा माँगना ही है, तो बराबरी से दोनों से माँगे। ये देहाती स्कूल इतनी बात
"मैं और लालकमीज़—हमारे पिछले हालात की वजह से कभी एक साथ नहीं रह सकते। लेकिन तुम्हारे बारे में मुझे लगता है कि जैसे अभी हो, वैसे ही छोड़ दिए जाओ तो कोई नुकसान नहीं होगा।" "मैं भी क्या लालकमीज़ के साथ रह सकता हूँ? यह सोचना कि मैं नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा—यह तो बड़ी ढिठाई है।" "तुम बहुत सरल हो..."
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