四 1
स्कूल में रात की ड्यूटी का प्रबंध था और शिक्षकगण बारी-बारी से उसे निभाते थे। केवल बिज्जू और लाल कमीज़ इसके अपवाद थे। मैंने पूछा कि आख़िर ये दोनों इस अनिवार्य कर्तव्य से मुक्त क्यों हैं, तो जवाब मिला कि उन्हें उच्च सरकारी पदों का दर्जा हासिल है। यह सुनकर बिल्कुल मज़ा नहीं आया। मोटी तनख्वाह लेते हैं, काम कम करते हैं, और फिर रात की ड्यूटी से भी बच निकलते हैं—क्या यह अत्याचार नहीं? मनमाने नियम बना लिए और चेहरे पर ऐसा भाव मानो सब कुछ जायज़ है। इतनी ढिठाई कैसे संभव है? इस बात से मैं बहुत असंतुष्ट हूँ, पर आँधी के अनुसार अकेले चिल्लाने से बात नहीं बनती। अगर बात सही हो, तो एक आदमी कहे या दो, उसे चल निकलना चाहिए। आँधी ने अंग्रेज़ी में "might is right" का हवाला देकर मुझे उपदेश देना चाहा, पर उसका मर्म समझ नहीं आया। दोबारा पूछने पर पता चला कि उसका अर्थ 'बलवान का अधिकार' है। बलवान के अधिकार का तो मुझे ज़माने भर से ज्ञान है। अब आँधी से व्याख्यान सुनने की ज़रूरत नहीं। बलवान का अधिकार और रात की ड्यूटी अलग-अलग बातें हैं। बिज्जू और लाल कमीज़ बलवान हैं—यह कौन स्वीकार करेगा? बहस अपनी जगह रही, पर आख़िरकार रात की ड्यूटी की बारी मेरी ओर आ ही गई। मैं बड़ा नकचढ़ा स्वभाव का हूँ; जब तक अपने बिस्तर पर आराम से न सोऊँ, ऐसा लगता ही नहीं कि नींद आई। बचपन से मैंने शायद ही कभी किसी दोस्त के घर रात गुज़ारी हो। जब दोस्त के घर भी रहना अच्छा नहीं लगता, तो स्कूल की रात की ड्यूटी तो और भी अखरेगी। अच्छी नहीं लगती, पर यह चालीस येन की तनख्वाह में शामिल है, तो कोई चारा नहीं। सब्र करके निभाऊँगा।
शिक्षक और विद्यार्थी सब लौट जाने के बाद अकेले मुँह बाए बैठे रहना बड़ी मूर्खता-सी लगती है। रात की ड्यूटी का कमरा पढ़ाई वाली कक्षाओं के पीछे स्थित छात्रावास के पश्चिमी छोर पर एक कमरा था। भीतर जाकर देखा, तो पश्चिम की धूप सीधे उस पर पड़ रही थी; इतनी तकलीफ़ कि टिकना मुश्किल हो गया। गाँव का मामला है—पतझड़ आ जाने पर भी गर्मी देखो कैसे बनी हुई है। विद्यार्थियों का भोजन मंगवाकर रात का खाना खा लिया, पर उसका स्वाद देखकर हैरान रह गया। ये लोग ऐसा खाना खाकर ही इतना उपद्रव मचाते हैं, तो निस्संदेह महाबली हैं। इतनी जल्दबाज़ी में शाम का खाना साढ़े चार बजे ही निपटा देते हैं, तो बेशक वीर हैं। खाना खा लिया, पर अभी अंधेरा नहीं हुआ, सो सोने का सवाल ही नहीं। जी चाहा कि ज़रा गर्म पानी के सोते पर चला जाऊँ। रात की ड्यूटी करते हुए बाहर निकलना ठीक है या बुरा—यह मुझे मालूम नहीं, पर ऐसे बेकार बैठे रहना और कैद की कठोर सज़ा जैसी तकलीफ़ सेहन करना मेरे बस की बात नहीं। जब पहली बार स्कूल आया, तो पूछा था कि ड्यूटी वाले कहाँ हैं? चपरासी ने जवाब दिया—वे ज़रा एक काम से बाहर गए हैं। उस समय मुझे अजीब लगा। पर अब जब मेरी बारी आई, तो बात समझ में आ गई। बाहर निकल जाना ही सही है।
मैंने चपरासी से कहा कि मैं थोड़ा बाहर जा रहा हूँ। उसने पूछा, कोई काम है क्या? मैंने जवाब दिया, काम नहीं, गर्म पानी के झरने में नहाने जा रहा हूँ, और झट से निकल पड़ा। लाल अँगोछा सराय में भूल आया, यह अफ़सोस है, लेकिन आज वहाँ से उधार ले लूँगा।
उसके बाद काफ़ी आराम से, अंदर-बाहर चक्कर लगाता रहा, आख़िरकार शाम ढलने पर रेलगाड़ी पकड़कर फुरुमाची स्टेशन पर उतर गया। स्कूल वहाँ से चार चो दूर है। कोई बात नहीं, चल पड़ा। सामने से बिज्जू आया। बिज्जू शायद इसी रेलगाड़ी से गर्म पानी के झरने जाने की योजना बना रहा था। वह तेज़ कदमों से चला आ रहा था। जब हम पास से गुज़रे, उसने मेरा चेहरा देखा, इसलिए मैंने हल्का-सा अभिवादन कर दिया। तब बिज्जू ने बड़े गंभीर भाव से पूछा, 'आज आपकी ड्यूटी नहीं थी क्या?' 'नहीं थी' का सवाल ही बेकार है। दो घंटे पहले उसने मुझसे यही तो कहा था, 'आज आपकी पहली रात की ड्यूटी है। मेहनत कीजिए।' क्या उसने यह नहीं कहा था? हेडमास्टर बन जाने पर लोग बड़ी टेढ़ी-मेढ़ी बातें करने लगते हैं। मुझे गुस्सा आ गया, इसलिए मैंने कहा, 'हाँ, ड्यूटी है। ड्यूटी है तो मैं लौटकर रात ज़रूर रुकूँगा।' यह कहकर बात ख़त्म की और आगे चल दिया। तातेमाची के चौराहे पर पहुँचा तो इस बार पहाड़ी तूफ़ान से टकरा गया। कितनी सकरी जगह है! जब भी बाहर निकलता हूँ, ज़रूर किसी से मुलाकात हो जाती है। उसने पूछा, 'अरे, तुम्हारी ड्यूटी है न?' मैंने कहा, 'हाँ, ड्यूटी है।' तब वह बोला, 'ड्यूटी वाला बेवजह बाहर घूमता फिरे, यह ठीक नहीं।' मैंने ग़ुरूर से कहा, 'बिल्कुल ठीक नहीं? घूमना ही ठीक है, न घूमना ठीक नहीं।' तब उसने ऐसी बात कही जो पहाड़ी तूफ़ान को शोभा नहीं देती: 'तुम्हारी यह लापरवाही भी भारी है। हेडमास्टर या उप-हेडमास्टर से टकरा गए तो मुश्किल होगी।' मैंने कहा, 'अभी-अभी हेडमास्टर से मुलाकात हुई है। उन्होंने मेरी सैर की तारीफ़ की, कहा कि गर्मी में सैर न की तो ड्यूटी करना मुश्किल हो जाता है।' फिर झुंझला कर जल्दी से स्कूल लौट आया। फिर सूरज जल्दी डूब गया। डूबने के बाद करीब दो घंटे तक चपरासी को ड्यूटी वाले कमरे में बुलाकर बातें करता रहा, लेकिन वह भी उबाऊ हो गया। तो सोचा, भले ही नींद न आए, चारपाई पर ही पड़ा रहूँ। सोने के कपड़े पहने, मच्छरदानी उठाई, लाल कंबल पटककर हटाया, और धड़ाम से बैठकर चित्त लेट गया। सोने के वक़्त धड़ाम से बैठने की यह आदत मुझे बचपन से है। जब मैं ओगावामाची के मकान में रहता था, तब नीचे की मंज़िल पर रहने वाले क़ानून के स्कूल के छात्र ने यह कहकर शिकायत की थी कि यह बुरी आदत है। क़ानून के छात्र कमज़ोर तो होते हैं, पर उनकी ज़बान बहुत तेज़ होती है। वह लंबी-चौड़ी बकवास करने लगा, तो मैंने उसे यह कहकर चुप करा दिया कि 'सोते समय जो धड़ाम की आवाज़ होती है, उसके लिए मेरे नितंब कसूरवार नहीं हैं। कसूरवार है तुम्हारे मकान की घटिया बनावट। शिकायत करनी हो तो मकान मालिक से करो।'
यह ड्यूटी कमरा दूसरी मंज़िल पर नहीं है, इसलिए चाहे कितनी भी ज़ोर से धड़ाम से गिरूँ, कोई हर्ज़ नहीं। जब तक पूरे ज़़ोर-शोर से न गिरूँ, नींद आने का एहसास ही नहीं होता। अहा, क्या मज़ा आया, और जैसे ही मैंने पैर खूब फैलाए, तो क्या देखता हूँ कि दोनों पैरों पर कुछ चिपक आया। वह खुरदरा था, पिस्सू जैसा भी नहीं लगता था, इसलिए मैं चौंक गया और कम्बल के अंदर ही पैरों को दो-तीन बार हिलाया। तो उन खुरदरी चीज़ों की तादाद अचानक बढ़ने लगी — पिंडलियों पर पाँच-छह जगह, जाँघों पर दो-तीन जगह, नीचे नितंब के पास एक चिपक कर कुचल गई, और एक नाभि तक उछल कर आ लगा — मैं और भी डर गया। झट से उठ बैठा और कम्बल को पीछे की ओर झटके से फेंका तो दबदबे के भीतर से पचास-साठ टिड्डे उछलकर बाहर निकल पड़े। जब तक उनकी पहचान नहीं हो पाई थी, कुछ अजीब-सा लग रहा था, लेकिन जब साफ़ हो गया कि ये टिड्डे हैं, तो अचानक गुस्सा आ गया। टिड्डे होकर लोगों को डराते हैं, करके दिखाओ क्या कर सकते हो — कहकर मैंने झट से गोल तकिया उठाया और दो-तीन बार फेंका, लेकिन निशाना बहुत छोटा था, इसलिए जितनी ज़ोर से फेंकता था, उतना असर नहीं होता था। मजबूर होकर फिर से दबदबे पर बैठ गया और जिस तरह कालिख साफ़ करते समय चटाई को लपेटकर tatami पीटते हैं, उसी तरह इधर-उधर बेतरतीब पीटने लगा। टिड्डे डर के मारे, ऊपर से तकिये के प्रहार से उछल उछलकर मेरे कंधों, सिर और नाक की नोक पर चिपकते और टकराते। जो चेहरे पर चिपकता, उसे तकिये से मारना मुमकिन नहीं था, इसलिए हाथ से पकड़कर पूरी ताकत से फेंकता। निराशाजनक बात यह थी कि चाहे कितनी भी ताकत लगाऊँ, वे जाकर मच्छरदानी से टकराते, वह बस हलके से हिलती और कोई असर नहीं होता। टिड्डे फेंके जाने की स्थिति में ही मच्छरदानी पर चिपके रहते। न मरते, न कुछ होते। आख़िरकार कोई तीस मिनट में टिड्डों का सफाया कर दिया। झाड़ू लाकर मरे हुए टिड्डों को बाहर निकाला। उसी समय चपरासी आकर बोला, "क्या हुआ?" तो मैंने कहा, "क्या हुआ क्या होगा? किस देश का आदमी बिस्तर में टिड्डे पालता है? निकम्मा!" इस पर उसने बहाना बनाया, "मुझे पता नहीं था।" "पता नहीं था से काम चल जाएगा?" कहकर मैंने झाड़ू बरामदे की तरफ फेंक दी, तो चपरासी डरते-डरते झाड़ू को कंधे पर उठाकर चला गया।
मैंने तुरंत तीन बोर्डिंग के छात्रों को प्रतिनिधि के रूप में बुलाया। तो छह आ गए। छह हों या दस हों, मुझे क्या फर्क पड़ता है। रात के कपड़ों में ही बाज़ू चढ़ाकर बातचीत शुरू की।
"टिड्डे जैसी चीज़ें मेरे बिस्तर में क्यों डालीं?"
"टिड्डे क्या चीज़ है?" सबसे आगे वाले ने कहा। बड़ा ही इत्मिनान से बोल रहा था। इस स्कूल में सिर्फ प्रिंसिपल ही नहीं, छात्र भी उल्टी-सीधी बोली बोलते होंगे।
"टिड्डे नहीं जानते? नहीं जानते तो दिखा दूँगा" — ऐसा कहा, पर अफ़सोस कि सबको बाहर निकाल चुका था, एक भी नहीं बचा था।
फिर मैंने चपरासी को बुलाकर कहा, “वे टिड्डे लाओ जो अभी थे।” उसने पूछा, “मैं तो उन्हें कूड़ेदान में फेंक चुका हूँ; क्या उठा लाऊँ?” “हाँ, तुरंत उठा लाओ,” मैंने कहा। चपरासी जल्दी-जल्दी भागा, लेकिन थोड़ी ही देर में कागज़ पर दस-बारह टिड्डे रखकर लाया और बोला, “माफ़ कीजिए, रात को बस इतने ही मिले; सुबह होते ही और भी ढूँढ लाऊँगा।” चपरासी तक बेवकूफ़ है।
मैंने एक टिड्डा विद्यार्थियों को दिखाकर कहा, “टिड्डा यह होता है। इतने बड़े-बड़े डील-डौल वाले हो और टिड्डा नहीं जानते—यह क्या बात है?” तब सबसे बाएँ बैठे गोलमुँह लड़के ने उद्दंडता से मुझे चुप कराते हुए कहा, “वह तो टिड्डी है, भाई।” मैंने उलटे उसकी बोलती बंद कर दी, “मूर्ख! टिड्डी और टिड्डा एक ही हैं। पह
स्कूल में घुसकर झूठ बोलते हैं, धोखा देते हैं, पीठ पीछे दबे पाँव ढीठ शरारतें करते हैं, और फिर बड़े मुँह से पास होकर समझते हैं कि उन्होंने शिक्षा प्राप्त कर ली। बात करने लायक नहीं, ऐसे निकम्मे सिपाही हैं।
मुझे ऐसे सड़ी सोच वाले लोगों से बातचीत करके जी मिचलाता है, इसलिए—"इतना कह दिए जाने पर सुनने की ज़रूरत नहीं। मिडिल स्कूल में...
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