四 2
यह कहकर कि “जो सभ्य और असभ्य में भेद नहीं कर सकते, वे दयनीय हैं,” मैंने उन छहों को छोड़ दिया। मेरी बोली और ढंग भले ही अधिक सभ्य न हों, पर मेरा मन इन लोगों की तुलना में कहीं अधिक सभ्य है, ऐसा मेरा विश्वास है। वे छहों इत्मीनान से निकल गए। ऊपरी तौर पर देखने से वे मुझ अध्यापक से कहीं बड़े लगते हैं। असल में उनका शांत बने रहना ही और भी बुरा है। मुझमें उन जैसी हिम्मत कभी नहीं हो सकती।
फिर मैं बिस्तर पर जाकर लेटा तो पिछले शोरगुल से मच्छरदानी के अंदर भिनभिनाहट मची थी। मोमबत्ती जलाकर एक-एक को जलाना झंझट है, इसलिए मैंने हुक उतार दिए, मच्छरदानी को लंबा करके तह किया और कमरे में आड़ा-तिरछा घुमाया तो कड़ियाँ उछलकर मेरे हाथ के पिछले हिस्से पर बुरी तरह लगीं। तीसरी बार जब मैं लेटा तो कुछ शांति मिली, पर नींद नहीं आई। घड़ी देखी तो साढ़े दस बजे थे। सोचता हूँ तो मैं कितनी मुसीबत की जगह आ पड़ा। वाकई, मिडिल स्कूल का अध्यापक जहाँ भी जाए, अगर उसे ऐसे प्राणियों से पाला पड़े तो दयनीय है। हैरानी है कि अध्यापकों की कमी नहीं पड़ती। बड़े ही धैर्यवान और भावनाशून्य लोग यह पेशा अपनाते होंगे। मैं तो किसी भी तरह यह बर्दाश्त नहीं कर सकता।
यह सोचकर कियो जैसी औरत बड़ी सराहनीय लगती है। वह पढ़ी-लिखी नहीं है, न ही उसकी कोई सामाजिक हैसियत है, पर एक इंसान के रूप में बहुत उच्च है। अब तक वह मेरी इतनी सेवा करती रही, पर मैंने उसका विशेष आभार कभी नहीं माना। इस तरह अकेला दूर प्रदेश में आकर पहली बार उसकी कृपा समझ में आई। अगर मुझे इचिगो की बाँस-पत्ती वाली मिठाई खानी हो, तो वह जान-बूझकर इचिगो तक जाकर खरीद लाती और मुझे खिलाती; और मैं उस कृपा के लायक हूँ। कियो मेरी इस बात की प्रशंसा करती है कि मैं लालची नहीं और सीधे स्वभाव का हूँ। पर जो प्रशंसा करती है, वह प्रशंसा पाने वाले मुझसे कहीं ज़्यादा बड़ा इंसान है। अचानक कियो से मिलने का जी चाहा।
कियो के बारे में सोचते हुए जब मैं इधर-उधर करवटें बदल रहा था, तभी अचानक मेरे सिर के ऊपर — गिनती में कोई तीस-चालीस लोग होंगे — इस तरह धड़ाधड़ की ताल पर फर्श पर पैर पटकने की आवाज़ हुई कि दूसरी मंज़िल गिर पड़े। उसके साथ ही पैरों की आवाज़ के अनुपात में बड़ा नारा गूँजा। मैं डरकर उछल पड़ा कि यह क्या हो गया। उछलते ही समझ गया — अच्छा, ये छात्र पिछली बात का बदला लेने के लिए हंगामा कर रहे हैं। अपने बुरे काम को अगर मैं यह कहकर स्वीकार न करूँ कि “वह बुरा था,” तो पाप नहीं मिटता। मुझे अपने उस बुरे काम का एहसास है। उन्हें तो सोने के बाद पछतावा करके सुबह माफ़ी माँगने आना चाहिए था। अगर माफ़ी न भी माँगें, तो भी उन्हें शर्मिंदा होकर चुपचाप सोना चाहिए। पर यह हंगामा क्या है? लड़कों का छात्रावास बनाया है, सूअर पालने के लिए तो नहीं। पागलों जैसी हरकतों की भी हद होती है।
देखूँ क्या होता है, सोचकर मैं सोने के कपड़ों में ही रात की ड्यूटी के कमरे से बाहर कूदा और सीढ़ियाँ साढ़े तीन छलाँगों में पार कर दूसरी मंज़िल पर पहुँच गया। तब आश्चर्य की बात यह हुई कि अभी तक मेरे सिर के ऊपर ज़रूर धड़ाधड़ हंगामा हो रहा था, वह अचानक शांत हो गया; न सिर्फ़ आवाज़ें, बल्कि पैरों की आहट तक बंद हो गई। यह अजीब है। लालटेन तो पहले ही बुझा दी गई थी, इसलिए अंधेरे में साफ़ पता नहीं चलता कि कहाँ क्या है, लेकिन वहाँ लोग हैं या नहीं, इसका अंदाज़ा माहौल से ही हो जाता है। पूर्व से पश्चिम तक फैले उस लंबे गलियारे में एक चूहा तक नहीं छिपा था। गलियारे के छोर से चाँदनी आ रही थी, और दूर का छोर धुँधले उजाले में नहाया हुआ था। कुछ तो गड़बड़ है। बचपन से मुझे अक्सर सपने देखने की आदत है; नींद में उछलकर उठ बैठता हूँ, समझ में न आने वाली बातें बड़बड़ाता हूँ, और लोग अक्सर मुझ पर हँसते हैं। सोलह-सत्रह साल की उम्र में, एक रात सपने में मुझे हीरा मिला था; उस रात मैं अचानक उठा और पास में सोए भाई से बड़े उग्र स्वर में पूछने लगा, “वह हीरा अब कहाँ किया?” उस समय पूरे घर में तीन दिनों तक मेरा मज़ाक उड़ा था और मैं बहुत परेशान हुआ था। शायद यह भी कोई सपना है। लेकिन—निश्चय ही कोई हंगामा हुआ था—गलियारे के बीच में यही सोचते हुए मैं खड़ा था कि चाँदनी वाले छोर पर “एक-दो-तीन, वाह!” —तीस-चालीस लोगों की आवाज़ें एक साथ गूँजीं, और उसके तुरंत बाद, पहले की तरह ताल लेकर सबने फर्श पर पैर पटके। देखो, यह सपना नहीं है, सच ही है। “चुप रहो, आधी रात है!” —मैंने भी उनसे कम तेज़ आवाज़ नहीं निकाली, और गलियारे के उस पार भागा। मेरा रास्ता अंधेरा था; बस छोर पर दिखती चाँदनी ही लक्ष्य थी। मैं मुश्किल से दो-चार गज़ ही भागा होगा कि गलियारे के बीच में एक सख़्त और बड़ी चीज़ से मेरी पिंडली टकराई, और “आह, दर्द!” का एहसास सिर तक गूँजते-गूँजते मेरा शरीर धड़ाम से आगे पटक गया। “कमीने!” कहकर मैं उठा, पर भाग नहीं सका। मन जल्दी करता था, लेकिन पैर कहना नहीं मानते थे। चिढ़कर मैं एक पैर पर उछलता हुआ आगे बढ़ा, पर तब तक पैरों की आहट और आवाज़ें सब शांत हो चुकी थीं; जंगल जैसा सन्नाटा छा गया था। इंसान चाहे कितना भी कायर हो, इतना कायर नहीं हो सकता। बिल्कुल सूअर हैं। अब तो मैंने ठान लिया कि जो छिपे हैं उन्हें घसीटकर बाहर निकालूँगा और जब तक वे माफ़ी नहीं माँगते, पीछे नहीं हटूँगा। एक शयनकक्ष का दरवाज़ा खोलकर अंदर देखने की कोशिश की, पर खुला नहीं। शायद ताला लगा था, या मेज़ आदि सामान लादकर अड़ा दिया गया था; कितना भी धकेलूँ, किसी तरह नहीं खुलता था। फिर मैंने सामने वाले उत्तरी कमरे का दरवाज़ा आज़माया। वह भी उसी तरह नहीं खुला। मैं दरवाज़ा खोलकर अंदर छिपे लोगों को पकड़ने की धुन में झुंझला ही रहा था कि फिर पूर्वी छोर पर युद्ध-नाद और पैरों की थाप शुरू हो गई।
इन सालों ने आपस में साज़िश करके चारों ओर से मिलकर मुझे मूर्ख बनाने की ठानी है — यह समझ तो गया, पर अब करूँ क्या, कुछ सूझता नहीं। साफ़-साफ़ कह दूँ कि मुझमें जितनी हिम्मत है, उतनी अक्ल नहीं। ऐसे मौके पर क्या करना चाहिए, यह मुझे ज़रा भी समझ नहीं आता। भले ही समझ न आए, पर हार तो माननी नहीं है। इसे यूँ ही छोड़ दिया तो मेरी इज़्ज़त पर बात आएगी। एदो का बाशिंदा कायर कहलाए, यह तो सोचकर भी ग़ुस्सा आता है। रात की ड्यूटी पर रहकर नाक-पोंछू छोकरों के हाथों मज़ाक बना, कुछ हाथ न आया और लोग समझें कि मजबूर होकर मैं आँसू बहाता-बहाता सो गया — यह उम्र भर की बदनामी होगी। भले ही आज क्या, मेरा मूल खानदान सोगुन का प्रत्यक्ष जागीरदार रहा है। जागीरदार का वंश सैवा-गेंजी कुल है और मैं तादा के मान्जू का वंशज हूँ। ऐसे गँवार किसानों से तो मेरा जन्म ही अलग है। बस, अक्ल की कमी ही खोट है। यही दुख है कि समझ में नहीं आता क्या करूँ। पर दुखी होऊँ माना, पर हार नहीं मानूँगा। मैं सीधा-सच्चा हूँ, इसीलिए समझ नहीं पाता। दुनिया में सीधाई ही जीतती है; ज़रा सोचो, जब सीधाई ही न जीते तो और कौन जीतेगा? आज रात जीत न हुई तो कल होगी। कल न हुई तो परसों होगी। परसों भी न हुई तो मेस से खाना मँगवाकर जब तक जीत न हो जाए, यहीं डटा रहूँगा। यह ठानकर मैंने गलियारे के बीचोबीच चौकड़ी मारी और सुबह होने का इंतज़ार किया। मच्छर भिनभिनाते हुए आए, पर मुझ पर कुछ असर नहीं हुआ। पहले जो पिंडली टकराई थी, उसे सहलाकर देखा तो कुछ गीला-गीला लग रहा है। खून ही निकला होगा। खून निकलना चाहता है तो निकलने दो। इसी बीच पहले की थकान हावी हुई और अचानक मुझे ऊँघ आ गई। तभी कुछ शोर-गुल सुनाई दिया। जैसे ही आँख खुली, 'अरे धत्!' करके मैं उछल पड़ा। मेरे बैठने की दाईं ओर वाला दरवाज़ा आधा खुला था और दो छात्र मेरे सामने खड़े थे। होश संभालते ही मैंने अपनी नाक के सामने खड़े छात्र की टाँग झपटकर पकड़ी और भरपूर ज़ोर से खींचा — वह धम से चित्त गिरा। खूब हुई! बचा हुआ दूसरा ज़रा सा घबराया ही था कि मैंने उस पर झपट्टा मारा, कंधे दबोचे और दो-चार बार धकेला-घुमाया। वह बेचारा अवाक् रह गया, बस पलकें झपकाता रहा। 'चल, मेरे कमरे तक चल!' कहकर जब घसीटने लगा तो पता चल गया कि डरपोक है — बिना कुछ पूछे-बोले ही पीछे-पीछे चलता आया। रात तो बहुत पहले कट चुकी थी।
जब मैंने उस साले को ड्यूटी कमरे में लाकर पूछताछ शुरू की, तो वह सुअर — चाहे मारो चाहे पटको, सुअर ही है — बस 'मुझे क्या पता' कहकर रट लगाए रहा। मालूम होता है उसने ठान लिया था कि इसी राग को जीवन भर अलापेगा, कबूल नाम मात्र को भी नहीं। इसी बीच एक आया, दो आए, धीरे-धीरे ऊपर से सबके सब ड्यूटी कमरे में आ जमा हुए। देखा तो सबकी पलकें नींद से सूजी हुई थीं। ओछे कहीं के! बस एक रात भर नहीं जागे और ऐसी शक्ल बना ली — क्या ऐसे लोग मर्द कहलाते हैं?
मैंने कहा—मुँह धोकर बहस करने आओ—पर कोई मुँह धोने नहीं गया।
मैं करीब पचास से अधिक लोगों से लगभग एक घंटे तक उलट-जवाब करता रहा, तभी अचानक लोमड़ा आ पहुँचा। बाद में पता चला कि चपरासी ने जान-बूझकर स्कूल में खबर दी थी कि हंगामा हो रहा है। इतनी छोटी बात के लिए प्रधानाचार्य को बुलाना बहुत कायरता है। इसीलिए वह मिडिल स्कूल में चपरासी जैसी नौकरी करता है। प्रधानाचार्य ने मेरी बात सुनी। छात्रों की बातें भी थोड़ी सुनीं। “फ़ैसला बाद में होगा; तब तक पहले की तरह स्कूल आते रहो। जल्दी मुँह धोओ और नाश्ता करो, वरना समय पर नहीं पहुँच पाओगे। जल्दी करो”—यह कहकर उसने सब आवासी छात्रों को छुट्टी दे दी। कितनी नरमी है। मैं होता तो उसी वक़्त सब आवासी छात्रों को स्कूल से निकाल देता। ऐसी ढिलाई करने से ही छात्र रात की ड्यूटी वाले शिक्षक का मज़ाक उड़ाते हैं। इसके अलावा उसने मुझसे कहा, “आप भी न जाने कितने परेशान हुए होंगे। आज आपको पढ़ाने की ज़रूरत नहीं है।” तब मैंने जवाब दिया—“नहीं, मुझे ज़रा भी चिंता नहीं है। ऐसा हंगामा अगर हर रात होता रहे, तो भी जब तक ज़िंदा रहूँ चिंता नहीं होगी। मैं पढ़ाऊँगा। अगर एक रात न सोने से पढ़ाने में दिक्कत हो, तो जो तनख़्वाह मिली है, वह स्कूल को लौटा दूँगा।” प्रधानाचार्य क्या सोचें, मेरे चेहरे को देखते रह गए और फिर चेताया, “पर आपका चेहरा काफ़ी सूज गया है।” सचमुच, कुछ भारी-सा लग रहा है। ऊपर से सारा चेहरा खुजला रहा है। मच्छरों ने ज़रूर बहुत काटा होगा। मैं पूरे चेहरे पर खुजलाते हुए बोला—“चेहरा कितना भी फूल जाए, मुँह से बात ठीक निकलती है, इसलिए पढ़ाई में कोई रुकावट नहीं होगी।” प्रधानाचार्य मुस्कुराए और तारीफ़ करने लगे, “आपमें ज़बरदस्त जोश है।” असल में यह तारीफ़ नहीं थी, मज़ाक़ था।
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