二 1
भूँ करके स्टीमर रुका, तो एक नाव किनारे से खुलकर खेती हुई आई। नाविक बिल्कुल नग्न था, केवल लाल लंगोटी बँधी थी। कितनी जंगली जगह है। हालाँकि इस गर्मी में कपड़े पहनना भी नामुमकिन है। धूप तेज़ है, इसलिए पानी चमक रहा है। देखते रहने से आँखें चौंधिया जाती हैं। क्लर्क से पूछने पर मालूम हुआ कि मुझे यहीं उतरना है। देखने में यह ओमोरी जितना बड़ा मछली पकड़नेवाला गाँव है। मैंने सोचा, ये मुझे बेवक़ूफ़ बना रहे हैं; ऐसी जगह आदमी रह ही कैसे सकता है? पर चारा नहीं था। धड़ल्ले से सबसे पहले कूद पड़ा। पीछे-पीछे पाँच-छह आदमी और चढ़े होंगे। उसके अलावा चार बड़े बक्से लादकर लाल-लंगोटी वाला किनारे की ओर खेने लगा। किनारे पर पहुँचते ही मैंने सबसे पहले छलाँग लगाई और झट से उस नाक-बहते लड़के को पकड़ लिया, जो वहीं खड़ा था, और पूछा, “मिडिल स्कूल कहाँ है?” लड़के ने भोलेपन से कहा, “पता नहीं।” निठल्ला गँवार कहीं का! बिल्ली के माथे जितने इस कस्बे में क्या कोई स्कूल का पता नहीं जानता? इतने में एक आदमी अजीब-सा कोट पहने आया और बोला, “इधर आओ।” मैं उसके पीछे हो लिया, तो वह मुझे “मिनाटोया” नाम की एक सराय में ले गया। वहाँ की औरतों ने एक स्वर में कहा, “पधारिए।” उन्हें देखकर-सुनकर अंदर जाने का जी नहीं हुआ। दरवाज़े पर ही खड़े-खड़े मैंने कहा, “मिडिल स्कूल का रास्ता बताइए।” तब पता चला कि स्कूल के लिए यहाँ से रेलगाड़ी से कोई दो री जाना पड़ेगा। यह सुनकर मुझे और भी अंदर जाने का जी नहीं हुआ। मैंने उस कोटवाले आदमी के पास से अपने दो चमड़े के बस्ते खींच लिए और धीरे-धीरे चल दिया। सरायवाले अजीब मुँह बनाकर देखते रहे।
रेलवे स्टेशन तुरंत मिल गया। टिकट भी बड़ी आसानी से मिल गया। अंदर बैठा तो देखा, माचिस की डिबिया जैसी रेलगाड़ी है। गड़गड़ाती हुई कोई पाँच मिनट चली होगी कि उतरना पड़ा। तभी तो टिकट सस्ता था—सिर्फ़ तीन सेन। फिर एक रिक्शा किराये पर लेकर मिडिल स्कूल पहुँचा, पर पढ़ाई खत्म हो चुकी थी और कोई नहीं था। चपरासी ने बताया कि रात की ड्यूटीवाला शिक्षक अभी एक काम से बाहर गया है। वाह, कितना बेफ़िक्र ड्यूटीवाला है! मैंने सोचा कि हेडमास्टर से ही पूछ लूँ, पर थक गया था, इसलिए रिक्शे पर सवार होकर रिक्शेवाले से कहा, “चलो, मुझे किसी सराय में चलो।” रिक्शेवाले ने धड़ल्ले से “यामाशिरोया” के सामने रिक्शा रोक दिया। यामाशिरोया वही नाम था, जो गिरवी की दुकानवाले कांतारो की दुकान का था, इसलिए थोड़ा मज़ाक़ आया।
वे मुझे दूसरी मंज़िल की सीढ़ियों के नीचे वाले अँधेरे कमरे में ले गए। इतना गर्म कि ठहरा न जाए। मैंने कहा, “ऐसा कमरा नहीं चाहिए।” तो वह बोला, “दुर्भाग्य से सभी कमरे भरे हुए हैं,” और मेरे बस्ते फेंककर बाहर चला गया। मजबूरी में मुझे कमरे में घुसकर पसीना बहाते हुए सब्र करना पड़ा। थोड़ी देर बाद उन्होंने नहाने को कहा, तो मैं छपाक से नहाने में कूद गया और तुरंत बाहर आ गया। लौटते समय झाँककर देखा तो कई कमरे खाली पड़े थे, जो ठंडे लग रहे थे।
बदतमीज़ बंदा है। झूठ बोल गया। फिर नौकरानी थाली ले आई। कमरा तपता हुआ था, पर खाना पेइंग गेस्ट हाउस से कहीं अच्छा था। परोसते हुए नौकरानी ने पूछा कि आप कहाँ से आए हैं, तो मैंने कहा — टोक्यो से। इस पर वह बोली, "टोक्यो अच्छी जगह होगी।" मैंने जवाब दिया, "ज़ाहिर है।" थाली उठाकर जब नौकरानी रसोई में गई, तब ज़ोर की हँसी सुनाई दी। बकवास है। तुरंत लेट गया, पर नींद नहीं आई। सिर्फ गर्मी ही नहीं थी, शोर भी था — पेइंग गेस्ट हाउस से पाँच गुना ज़्यादा। ऊँघते ही कियो का सपना देखा। कियो एचिगो की बाँस-पत्ती में लिपटी मिठाई बाँस की पत्ती समेत चटखारे लेकर खा रही थी। मैंने कहा, बाँस की पत्ती ज़हर होती है, इसे छोड़ दो तो अच्छा है। उसने कहा, "जी नहीं, यह पत्ती दवा है" — और मज़े से खाती रही। मैं हैरान रह गया और मुँह खोलकर "हा हा हा हा" हँसा, तो आँख खुल गई। नौकरानी लकड़ी के किवाड़ खोल रही थी। आसमान पहले की तरह ऐसा साफ़ था, मानो उसकी तली ही टूट गई हो।
सुना था कि सफ़र में बख्शीश देनी चाहिए। सुना था कि बख्शीश न देने पर बुरा सलूक होता है। इस तंग और अँधेरे कमरे में मुझे ठूँसना भी शायद बख्शीश न देने की वजह से है। या फिर इसलिए कि भद्दे कपड़े पहने हूँ, हाथ में कैनवस की अटैची और ऊनी छाता लटकाए हूँ। गँवार होकर भी लोगों को नीची नज़र से देखते हैं! सबसे बड़ी बख्शीश देकर चौंका दूँगा। मैंने पढ़ाई के खर्चे में से बचे करीब तीस येन जेब में डाले और टोक्यो से निकला हूँ। रेल और स्टीमर का किराया और दूसरे खर्चे निकाल दूँ, तो भी करीब चौदह येन बचे हैं। सब दे दूँगा तो क्या — अब तो महीने की तनख्वाह मिलेगी। गँवार कंजूस होते हैं — पाँच येन भी दे दूँ तो पक्का हैरानी से आँखें फाड़ देंगे। देखूँ क्या करते हैं — यह सोचकर बेफिक्र होकर मुँह धोया और कमरे में लौटकर बैठा रहा, तो कल वाली नौकरानी थाली ले आई। खाना परोसते हुए वह दाँत निकालकर मुस्कुरा रही थी। बदतमीज़ बंदी है। क्या मेरे चेहरे पर मेला लगा है? फिर भी यह मुँह इस नौकरानी की सूरत से कहीं बेहतर है। सोचा था कि खाना खत्म करने के बाद करूँगा, पर चिढ़ हो गई, तो खाने के बीच में ही पाँच येन का एक नोट निकालकर बोला — इसे बाद में काउंटर पर ले जाना। नौकरानी ने अजीब-सा मुँह बनाया। फिर खाना खत्म करके तुरंत स्कूल के लिए निकल पड़ा। जूते साफ़ नहीं किए थे।
स्कूल कल रिक्शे से पहुँचा था, इसलिए अंदाज़ा हो गया था। दो-चार मोड़ घूमते ही सीधे गेट के सामने आ गया। गेट से दरवाज़े तक ग्रेनाइट के पत्थर बिछे हैं। कल जब इन पत्थरों पर रिक्शे से गुज़रा था, तो बहुत ज़्यादा शोर हुआ था, इसलिए थोड़ी झेंप हुई थी। रास्ते में ओगुरा की वर्दी पहने कई छात्र मिले — सब इसी गेट से अंदर जा रहे थे।
उनमें कुछ ऐसे भी थे जो मुझसे लंबे और ताकतवर दिख रहे थे। ऐसों को पढ़ाना होगा, यह सोचते ही मन में कुछ अजीब-सी बेचैनी हुई। मैंने अपना कार्ड दिया तो मुझे प्रिंसिपल के कमरे में भेज दिया गया। प्रिंसिपल पतली-सी दाढ़ी वाला, साँवले रंग का, बड़ी-बड़ी आँखों वाला एक बिज्जू-जैसा आदमी था। और बड़ा ही ठस्से में था। बोला, “अच्छा, मन लगाकर पढ़ाइयेगा,” और बड़ी गंभीरता से एक बड़ी मोहर लगा हुआ नियुक्ति-पत्र मुझे थमाया। यह नियुक्ति-पत्र मैंने टोक्यो लौटते समय गोल करके समुद्र में फेंक दिया था। प्रिंसिपल ने कहा कि अभी वह मेरा परिचय शिक्षकों से करवाएँगे, इसलिए मैं हर एक को यह नियुक्ति-पत्र दिखाऊँ। बेकार की मेहनत। इतनी झंझट करने से तो यही अच्छा था कि यह पत्र तीन दिन के लिए स्टाफ़ रूम में चिपका दिया जाता।
पहले पीरियड की तुरही बजने पर ही शिक्षक स्टाफ़ रूम में इकट्ठा होते थे। अभी काफ़ी समय था। प्रिंसिपल ने घड़ी निकालकर देखा और कहा कि वह धीरे-धीरे, खुलकर सब बात करेंगे, लेकिन पहले मुझे मोटा-मोटा हाल समझ लेना चाहिए। फिर उसने शिक्षा की भावना पर एक लंबा उपदेश सुनाया। मैं निश्चय ही ऊपर-ऊपर से सुनता रहा, लेकिन बीच में ही मुझे लगा कि मैं किसी मुसीबत में फँस आया। जैसा प्रिंसिपल कह रहा था, वैसा मैं कदापि नहीं कर सकता। मुझ जैसे लापरवाह आदमी को पकड़कर वह माँग रखता है—विद्यार्थियों का आदर्श बनो, पूरे स्कूल के लिए अनुकरणीय बनो, पढ़ाने के अलावा अपने नैतिक प्रभाव से विद्यार्थियों का चरित्र सुधारो नहीं तो शिक्षक नहीं कहला सकते। ऐसी अनाप-शनाप, नामुमकिन शर्तें। क्या ऐसा महान आदमी चालीस येन की तनख्वाह पर इतनी दूर इस देहात में आता है? इंसान आखिर इंसान ही होता है। मुझे लगता था कि गुस्सा आने पर कोई भी एक-आध बार लड़ाई कर ही लेता है। पर यहाँ तो न बोलना बनता है, न घूमना-फिरना। अगर नौकरी सचमुच इतनी मुश्किल है, तो रखने से पहले ही यह सब बता देना चाहिए था। मुझे झूठ बोलने से नफ़रत है, इसलिए मैंने सोचा—कोई बात नहीं, दग़ा खाकर आया हूँ, अब यहीं साफ़ इनकार करके वापस चलता हूँ। सराय में पाँच येन दे चुका था, इसलिए बटुए में अब नौ येन या उसके आस-पास ही बचे थे। नौ येन में टोक्यो तक नहीं पहुँचा जा सकता। बख्शीश ही न देनी चाहिए थी। पैसा गया, कुछ हाथ नहीं आया। लेकिन नौ येन में भी कोई रास्ता निकल ही आता है। मैंने सोचा कि सफ़र का खर्चा अधूरा रह जाए तो भी झूठ बोलने से अच्छा है। फिर मैंने कहा, “मैं आपके कहे हरगिज़ कर नहीं सकता। यह नियुक्ति-पत्र आपको लौटाता हूँ।” प्रिंसिपल ने अपनी बिज्जू-सी आँखें झपकाईं और मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर हँसकर बोला, “वह तो महज़ आकांक्षा थी। मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि आप उस आकांक्षा पर खरे नहीं उतर सकते, इसलिए चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं।” जब इतना अच्छी तरह जानता था, तो शुरू से ही डराने की क्या ज़रूरत थी।
इसी बीच तुरही बज उठी। कक्षाओं की तरफ़ अचानक शोर-गुल मच गया।
कहा गया कि शिक्षक भी अब कक्ष में इकट्ठे हो गए होंगे, तो मैं प्रधानाचार्य के पीछे-पीछे शिक्षक कक्ष में घुस गया। लंबे-तंग कमरे के चारों ओर मेज़ें लगी थीं और सब बैठे हुए थे। मुझे अंदर आते देखकर सबने मानो आपस में तय करके मेरी तरफ़ देखा। देखो, मैं कोई तमाशा नहीं हूँ। फिर जैसा आदेश हुआ था, वैसे ही मैं एक-एक के सामने गया और नियुक्ति-पत्र देकर अभिवादन किया। अधिकतर लोग कुर्सी से उठकर केवल झुक जाते थे, पर जो बहुत सतर्क थे, वे मेरा दिया नियुक्ति-पत्र लेकर उसे एक बार देखते और फिर आदर के साथ लौटा देते। बिल्कुल दरबारी नाटक की नकल। जब पंद्रहवें नंबर पर शारीरिक शिक्षा के शिक्षक के पास पहुँचा, तब तक यही काम कई बार करके मुझे कुछ झुंझलाहट हो गई। उनका काम एक बार में खत्म हो जाता है। मेरी तरफ़ से वही क्रिया पंद्रह बार दोहराई जा रही है। थोड़
जब उसने विनम्रतापूर्वक नियुक्ति-पत्र दिखाया, तो उसने उसकी ओर देखा तक नहीं, बल्कि कहा, "अरे, तुम ही नए व्यक्ति हो क्या? थोड़ा घूम आओ, हा हा हा।" यह 'हा हा हा' क्या है! ऐसी भी क्या शिष्टता नहीं जानते वे।
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